समाज (Society)


साधारण अर्थ में समाज का तात्पर्य व्यक्तियों के समूह के लिए किया जाता है | लेकिन समाजशास्त्रीय अर्थों में व्यक्तियों के बीच जो सामाजिक संबंध पाए जाते हैं ,उसी को समाज कहते हैं | प्रश्न उठता है सामाजिक संबंध किसे कहते हैं ? जब दो व्यक्ति आपस में मिलते हैं तो आपस में सामाजिक नियमों के अंतर्गत बातचीत करते हैं | सामाजिक नियम का तात्पर्य जब हम अपने मित्र ,भाई ,बहन, माता ,पिता ,पड़ोसी ,रिश्तेदार , अजनबी आदि से मिलते हैं ,तब सबके साथ बातचीत में कुछ न कुछ औपचारिकता या अनौपचारिकता रहती है | इसी औपचारिकता एवं अनौपचारिकता को सामाजिक नियम कहते हैं |

दो लोगों में बातचीत जब सामाजिक नियमों के तहत होने लगती है ,तब इसे हम अंतः क्रिया (Interaction) कहते हैं | इसी अंतःक्रिया की जब बारंबारता (एक से अधिक बार) होती है ,तब इसे सामाजिक संबंध कहते हैं | इन्हीं संबंधों को समाज कहा जाता है ,जो अमूर्त होता है ,तात्पर्य है कि सामाजिक संबंध हमें दिखाई नहीं देते हैं |

एक व्यक्ति के अनेकों व्यक्तियों से सामाजिक संबंध होते हैं , साथ ही उन सभी के भी अनेकों  से सामाजिक संबंध होते हैं , इस तरह ये संबंध एक जाल की तरह हो जाता है | मैकाइवर एवं पेज (Maciver and Page) ने इन्ही अर्थों में समाज को सामाजिक संबंधों का जाल (Web of social relationships) कहा है|

समाज मुख्यतः अमूर्त होता है | लेकिन कभी-कभी हम व्यक्तियों के समूह को भी समाज कहते हैं , जैसे ब्रह्म समाज | तब इसे हम समाज न कहकर एक समाज कहते हैं | यह एक उस समाज का नामकरण है जैसे  ब्रह्म समाज में ब्राह्म | यह मूर्त होता है |

समाज की परिभाषा (Definition of Society)
 

ग्रीन (Green) के अनुसार “समाज वह वृहत्तम समूह है जिसका कोई भी सदस्य बन सकता है |”  सी.एच. कूले (C. H. Cooley) के अनुसार “मानव समाज में समूह तथा व्यक्ति एक ही सिक्के के दो पहलू हैं व्यक्ति के बिना समाज एवं समाज के बिना व्यक्ति की कल्पना नहीं की जा सकती है |”

गिडिंग्स (Giddings) के अनुसार “समाज अपने आप में एक संघ है |”(Society is a union in itself )

हैरी एम.जॉनसन (Harry M. Johnson) के अनुसार “समाज और कुछ नहीं बल्कि समूहों का संग्रह (Collection of groups) है |”

मोरिस गिन्सबर्ग (Morris Ginsberg) के अनुसार “समाज व्यक्तियों का संग्रह है |” (Society is the collection of individuals)

एक अन्य जगह मैकाइवर एवं पेज (Maciver and Page) समाज की विस्तृत परिभाषा देते हैं उनके अनुसार “समाज रीतियों (usages), कार्य-प्रणालियों (procedures) ,सत्ता (authority), पारस्परिक सहयोग (mutual aid), समूह एवं विभाजनों, मानव व्यवहार के नियंत्रणों एवं स्वतंत्रता (Liberty) की व्यवस्था है |”

डब्ल्यू.आइ. थॉमस  (W. I. Thomas) समाज को सामूहिक रुझान (common propensity) से परिभाषित करते हैं |

जॉनसन ने अपनी पुस्तक सोशियोलॉजी : ए सिस्टमेटिक इंट्रोडक्शन  (Sociology : A Systematic Introduction) में समाज को मूर्त रूप में परिभाषित करते हुए इसके चार बुनियादी तत्वों की चर्चा की

 (1) निश्चित भू -भाग (Definite territory)

(2) संतान उत्पत्ति (Sexual reproduction)

(3) सर्वांगव्यापी संस्कृति (Comprehensive culture)

(4) आत्मनिर्भरता (Independence)

समाज मूलतः प्रघटना न  होकर प्रक्रिया को ही व्यक्त करता है | मशीन द्वारा उत्पादित वस्तुएं मशीन के नष्ट हो जाने के बाद भी बनी रहती हैं, लेकिन समाज का निर्माण करने वाली प्रक्रिया के लुप्त होते ही समाज भी लुप्त हो जाता है | इसीलिए मैकाइवर एवम् पेज ने कहा है कि “समाज केवल कालक्रम में ही रहता है|” (Society exists only in a time sequence)

समाज की विशेषताएं (Characteristics of Society)
 

(1) समाज अमूर्त होता है – समाज सामाजिक संबंधों को कहते हैं |जो दिखायी नहीं देता है |अतः यह  अमूर्त होता है |

(2) पारस्परिक जागरुकता (Mutual awareness) -लोगों के बीच संबंध प्रत्यक्ष (आमने-सामने ) या अप्रत्यक्ष (जैसे टेलीविजन पर किसी का भाषण सुनकर अनुकरण करना) संपर्क के कारण धीरे-धीरे विकसित होता है इन संबंधों की स्थापना व्यक्ति द्वारा जागरुकता की दिशा में ही किया जा सकता है |

(3)  समाज में समानता एवं भिन्नता – समाज में अधिकांश सदस्यों के दृष्टिकोण समान होते हैं ,साथ ही वे समाज द्वारा स्वीकृत लक्ष्यों की प्राप्ति हेतु मिल जुलकर कार्य करते हैं , एफ.एच. गिडिंग्स (F.H.Giddings) ने इसे स्वजातीय चेतना(Consciousness of kind) कहा है |

भिन्नता का तात्पर्य समाज के सदस्यों की रुचियों, योग्यताओं ,कार्यों, स्वभाव आदि संबंधी भेद होते हैं | यदि पूरी तरह समानता होती तो चीटियों, मधुमक्खियों जैसे सब सीमित प्रतीत होते | समान आवश्यकताओं के कारण असमान कार्यों काे पूरा करने के लिए एक दूसरे का सहयोग करते हैं |

(4) समाज में सहयोग एवं संघर्ष –  सरल समाज से लेकर आधुनिक जटिल समाज तक में सहयोग एवं संघर्ष दोनों पाये जाते हैं | प्रत्येक कार्य या उद्देश्य में सफलता का आधार सहयोग ही है | व्यक्ति विभिन्न परिस्थितियों में कुछ लोगों के साथ सहयोग करता है तो वही अन्य लोगों के प्रति उसका दृष्टिकोण असहयोग, संघर्ष, द्वेष का भी होता है | इसीलिए मैकाइवर एवं पेज ने समाज को संघर्ष जनित सहयोग कहा है | (Society is co-operation crossed by conflict).

(5)  समाज मनुष्यों तक सीमित नहीं – मनुष्यों के अतिरिक्त अन्य जीवों जैसे पशु-पक्षियों में भी कुछ न कुछ संबंध एवं जागरुकता पायी जाती है ,भले ही यह अल्पकालीन क्यों न हो | क्योंकि संबंधों को ही समाज कहते हैं अतः इनमें भी समाज पाया जाता है | इसीलिए मैकाइवर एवं पेज ने कहा है कि “समाज मनुष्यों तक सीमित नहीं है ,जहां कहीं जीवन है वहां समाज है |” (Society is not confined to man only, where there is life there is society).

समाज के प्रकार (Types of Society)
 

(1) जनजातीय समाज (Tribal Society) -यह प्रारंभिक समाज है |समाज का विस्तार नातेदारी तक सीमित होता है | श्रम विभाजन नहीं पाया जाता है | केवल मानवीय ऊर्जा का प्रयोग करते हैं ,पशु एवं प्रौद्योगिकी का उपयोग नहीं कर पाते हैं | जीविकोपार्जन के लिए शिकार एवं खाद्य- संग्रह पर निर्भर रहते हैं |जादू एवं तंत्र-मंत्र का प्रभाव रहता है | अतिरिक्त उत्पादन समूह के भीतर या समूहों के बीच वस्तु-विनिमय के लिए होता है |

(2) कृषक समाज (Agrarian Society) – इस समाज का स्थायी निवास होता है एवं मुख्यत: कृषि कार्य से जुड़े रहते हैं | कृषि उत्पादन के लिए मानवीय उर्जा के साथ पशु उर्जा का प्रयोग करते हैं | अतिरिक्त उत्पादन के लिए आंशिक बाजार पाया जाता है |

(3)  औद्योगिक समाज (Industrial Society) – इस समाज में उन्नत प्रौद्योगिकी पायी जाती है | इस समाज में निजी संपत्ति का अविर्भाव हुआ | शिक्षा का प्रसार अधिक होता है | मानवीय ऊर्जा के साथ निर्जीव ऊर्जा (मशीनों का संचालन तेल या बिजली द्वारा ) का प्रयोग करते हैं |पूँजीपति उत्पादन मुनाफा के लिए करते हैं| अधिकतर सामाजिक संबंध भावनात्मक न होकर आवश्यकताजनित होते हैं |श्रम विभाजन स्पष्ट होता है |

(4) उत्तर औद्योगिक समाज (Post Industrial Society) – उत्तर-औद्योगिक समाज शब्द का प्रयोग सर्वप्रथम डेनियल बेल(Daniel Bell) ने किया था | इस समाज में सेवा क्षेत्र अधिक महत्वपूर्ण हो जाता है | उत्पादन की जगह उपभोग तथा अवकाश का क्षेत्र बढ़ता जाता है | इस समाज में संपत्ति अर्जन का आधार ज्ञान या प्रौद्योगिकी होता है| मशीनीकरण की जगह स्वचालिनीकरण (Automation) की महत्ता बढ़ जाती है | श्रम विभाजन के स्थान पर विशेषीकरण (Specialization) का महत्त्व अधिक होता  है |

ऐतिहासिक या उद्विकास(Historical or evolutionary) के आधार पर अनेक विद्वानों ने समाज का वर्गीकरण निम्नवत किया है –

ब्रिटिश विद्वान हरबर्ट स्पेंसर (Herbert Spencer) के अनुसार

(1) सरल समाज (Simple Society)

(2) मिश्रित समाज (Compound Society)

(3) दोहरे मिश्रित समाज (Doubly compound society)

(4) तिहरे मिश्रित समाज (Trebly compound society)

फ्रांसीसी समाजशास्त्री एमिल दुर्खीम (Emile Durkheim) के अनुसार

(1) सरल समाज (Simple Society)

(2) सरल बहुखण्डीय समाज (Simple Polysegmetary Society)

(3)  मिश्रित बहुखण्डीय समाज (Compound Polysegmentary Society)

(4) दोहरे मिश्रित बहुखण्डीय समाज (Doubly Compound Polysegmentary Society)

एल. एच. मॉर्गन(L. H. Morgan)  ने अपनी पुस्तक एन्सिएन्ट सोसाइटी (Ancient Society) में संस्कृति के उद्विकास को समाज के माध्यम से दर्शाया है

(1) जंगल अवस्था (Savagery)

(2) बर्बर अवस्था (Barbarism)

(3) सभ्य अवस्था (Civilization)

फ्रांसीसी विद्वान ऑगस्त कॉम्टे (August Comte) का त्रिस्तरीय सिद्धांत (Law of Three Stages) बौद्धिक विकास की अवस्था का प्रतिनिधित्व करता है जिसका परिणाम सामाजिक प्रगति में दिखाई देता है,यह तीन अवस्थाएं निम्न है-

(1) धार्मिक अवस्था (Theological or Religious Stage) – इस अवस्था में यह माना जाता है कि सभी सामाजिक घटनाएँ दैवीय शक्तियों द्वारा संचालित होती हैं |

(2) तात्विक या दार्शनिक अवस्था (Metaphysical or Philosophical Stage) – इस अवस्था के समाज में ज्ञान का स्रोत अमूर्त होता है |

(3) वैज्ञानिक या प्रत्यक्षवादी अवस्था (Scientific or Positive Stage) – इस अवस्था के समाज में  प्राकृतिक एवं सामाजिक घटनाएँ वैज्ञानिक नियमों द्वारा निर्धारित होती है |

जर्मन समाजशास्त्री टॉनीज (Tonnies) ने सामाजिक बंधन (Social ties) को दो श्रणियों में विभाजित किया –

(1) गेमेनशाफ्ट (Gemeinshaft)

(2) गेसेलशाफ्ट (Gesellshaft)

गेमेनशाफ्ट एवं गेसेलशाफ्ट जर्मन शब्द है ,जिसका अर्थ क्रमशः समुदाय एवं समाज होता है |

जर्मन विद्वान मार्क्स (Marx) ने आर्थिक आधार पर पांच प्रकार के समाजों का उल्लेख किया है –

(1) आदिम साम्यवाद (Primitive Communism)

(2) एशियाई समाज (Asiatic Society)

(3) प्राचीन समाज (Ancient Society)

(4) सामंतवादी समाज (Feudal Society)

(5) पूँजीवादी समाज (Capitalist Society)

मार्क्स ने भविष्य में आने वाले दो समाजों की भी चर्चा की ,पहला – समाजवाद (Socialism) एवं दूसरा साम्यवाद (Communism) | मार्क्स के अनुसार साम्यवादी समाज आते ही युग परिवर्तन (समाज में परिवर्तन) का चक्र रुक जाएगा | यह समाज की अंतिम अवस्था होगी |

 

विभिन्न विद्वानों ने द्विविभाजन (Dichotomy) के आधार पर भी समाज का वर्गीकरण किया

ब्रिटिश विद्वान हेनरी मेन (Henry Maine) ने अपनी पुस्तक एन्सिएन्ट लॉ (Ancient Law) में समाज का द्विविभाजन प्रस्तुत किया

प्रस्थिति एवं संविदा (Status and Contract)

हावर्ड बेकर —  पवित्र एवं लौकिक (Sacred and secular)

मार्गन  –  सोसिटास एवं सिविटास (Societas and Civitas)

स्पेंसर  —  सैन्य समाज एवं औद्योगिक समाज ( Military or Militant and Industrial)

समाज एवं “एक समाज” में अंतर ( “Difference between Society and “A Society”)

समाज सामाजिक संबंधों से मिलकर बना है एवं यह अमूर्त  होता है, जबकि एक समाज व्यक्तियों का समूह है ,जो साधारणतः सामान्य जीवन में भागीदार होते हैं , जैसे – ब्रह्म समाज| यह मूर्त होता है | इसके अंतर को निम्न विंदुआें में देखा जा सकता है-

(1) समाज सामाजिक संबंधों की एक व्यवस्था है ,जबकि एक समाज व्यक्तियों का एक समूह है |

(2) समाज अमूर्त होता है, जबकि एक समाज मूर्त होता है |

(3) समाज का सामान्यतः कोई भौगोलिक क्षेत्र नहीं होता है, जबकि एक समाज का साधारणतः एक निश्चित भौगोलिक क्षेत्र होता है |

(4) समाज के निर्माण में सहयोग एवं संघर्ष दोनों संबंध होते हैं, जबकि एक समाज के निर्माण में सहयोग को ही प्राथमिक महत्त्व दिया जाता है |

मानव एवं पशु समाज में अंतर (Distinction between Human and Animal Society)
 

मनुष्य के अतिरिक्त अन्य जीवों (पशु-पक्षियों) में भी समाज पाया जाता है ,लेकिन इनमें सामाजिक संबंध अल्प कालीन होते हैं | पशुअों में समाज तो पाया जाता है लेकिन संस्कृति नहीं पायी जाती है | किंग्सले डेविस (Kingsley Davis) ने अपनी पुस्तक ह्यूमन सोसाइटी (Human Society) में कहा है कि यदि कोई एक कारक मनुष्य के अनूठेपन की व्यवस्था कर सकता है, तो वह तत्त्व यह है कि केवल मनुष्य में ही संस्कृति पायी जाती है, पशुओं में नहीं | डेविस ने पशु समाज को बायो- सोशल सिस्टम (Bio -social system) एवं मनुष्य समाज को सोसियो- कल्चरल सिस्टम (Socio-cultural system) कहा है |  मानव एवं पशु समाज के अंतर को निम्न बिंदुओं में देखा जा सकता है |

(1) मानव समाज में संस्कृति पायी जाती है ,पशु समाज में नहीं |

(2) मानव समाज में मूल प्रवृत्ति (Instinct) सामान्यतः नहीं पायी जाती है, जबकि पशु समाज में क्रियाकलाप अधिकतर मूल प्रवृत्तियों पर ही आधारित होते हैं |

(3) मानव सीखने की अनंत क्षमता के साथ पैदा होता है, जबकि पशु में सीखने की क्षमता बहुत ही कम होती है |

(4) मानव बोलकर अपने भावों को भाषा द्वारा प्रकट कर सकता है ,जबकि पशु केवल विशेष प्रकार की आवाज ही निकाल सकते हैं |

(5) चूँकि मानव मस्तिष्क अधिक विकसित होता है | अत: उसमें तर्क-वितर्क करने की क्षमता होती है ,जबकि पशुओं के मस्तिष्क कम विकसित होने के कारण तर्क शक्ति का अभाव पाया जाता है |

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3 thoughts on “<center>समाज (Society) <center/>”

  1. Sir/madam ,आपने कौन से पुस्तक को रिफर किया था?
    मैं इस पुस्तक को लेना चाहता हूं

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