सांस्कृतिक विघटन (Cultural Disorganization)


सांस्कृतिक विघटन क्या है –

प्रत्येक समाज में जीवन एवं समाजीकरण का आधार संस्कृति होती है| संस्कृति समाज के नैतिक मूल्यों, प्रथाओं, परम्पराओं, नियमों, व्यवहार के तरीकों आदि को समाहित करती है, लेकिन तेजी से बदलते समाज एवं भौतिकवादी प्रवृत्ति के कारण लोग सांस्कृतिक मूल्यों का पालन करने में कठिनाई महसूस करते हैं या विचलित हो जाते हैं, जो अनेक विरोध एवं संघर्ष को जन्म देता है| इसे ही सांस्कृतिक विघटन कहते हैं|

इलिएट एवं मेरिल के अनुसार सांस्कृतिक परिवर्तन के कारण बहुत से नवीन विचारों, आदर्शों, मूल्यों का हमारे सांस्कृतिक जीवन में समावेश हो जाता है, जिसके फलस्वरूप न केवल व्यक्ति की आदतें बदलती हैं बल्कि उसका जीवन क्रम भी बदल जाता है| ऐसी स्थिति में पुराने आदर्शों, नियमों, विचारों और मूल्यों से नए विचारों तथा आदर्शों का संघर्ष आरंभ हो जाता है| इस संघर्ष के परिणाम स्वरूप सांस्कृतिक जीवन में पैदा होने वाले असंतुलन को हम सांस्कृतिक विघटन कहते हैं|

सामान्यतः तेजी से बदलती तकनीक एवं मानववादी सोच ने एक तरफ पुरानी मान्यताओं जैसे – छुआछूत, तीन तलाक, दहेज को दरकिनार करने का प्रयास किया तो दूसरी तरफ भ्रष्टाचार एवं नैतिक पतन ने सांस्कृतिक ढाँचे को पूरी तरह विघटित करने का प्रयास भी किया|

सांस्कृतिक विघटन के कारण (Causes of Cultural Disorganization) –

(1) तेजी से परिवर्तित होते समाज के मूल्य एवं प्रतिमान|

(2) नैतिक पतन|

(3) भौतिकवादी सोंच|

(4) व्यक्तिवादिता|

(5) शिष्टाचार एवं व्यवहार के तरीकों में परिवर्तन|

(6) सांस्कृतिक संस्थाओं जैसे – धार्मिक संस्था के प्रभाव में कमी|

(7) आधुनिकीकरण एवं पश्चिमीकरण

(8) सोरोकिन ने कहा है कि जब इंद्रियपरक (Sensate) संस्कृति अर्थात् इंद्रियात्मक सुख की मात्रा विचारात्मक संस्कृति (Ideational Culture) से अधिक एवं प्रभावी हो जाती है तो इस स्थिति को सांस्कृतिक विघटन कहते हैं|

सांस्कृतिक विघटन को दूर करने के उपाय –

(1) भौतिकतावाद एवं उपभोक्तावाद को कभी अपने विचारों पर हावी नहीं होने देना चाहिए|

(2) परम्पराओं को भी आधुनिकता में स्थान देना चाहिए| इसे प्रो. योगेंद्र सिंह के भारतीय परम्परा का आधुनिकीकरण (Modernisation of Indian Tradition) की अवधारणा में देखा जा सकता है|

(3) समाज के मूल्यों एवम् आदर्शों में समय के अनुसार संशोधन आवश्यक है| लेकिन पूरी तरह परिवर्तन नहीं करना चाहिए|

(4) शिक्षा के प्रत्येक स्तर पर नैतिक शिक्षा को अवश्य सम्मिलित करना चाहिए|

(5) ऐसे राजनीतिज्ञ जो युवाओं को धर्म एवं नैतिकता के नाम पर प्रदर्शन एवं अनुशासनहीनता के लिए प्रेरित करते हैं, उन पर सख्त कार्यवाही करनी चाहिए|

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