अल्पसंख्यक (Minorities)


भारत में अल्पसंख्यक –

भारतीय संविधान में अल्पसंख्यक की कोई परिभाषा नहीं दी गई है| लेकिन अनुच्छेद 29 एवं 30 में अल्पसंख्यक वर्ग के लिए जो अधिकार दिए गये हैं उससे स्पष्ट होता है कि धर्म, भाषा एवं लिपि या संस्कृति को अल्पसंख्यक का आधार माना गया है| अतः धार्मिक समूह के साथ-साथ सांस्कृतिक आधार पर जनजातीय भी अल्पसंख्यक वर्ग में आ जाते हैं|

धार्मिक आधार पर मुस्लिम, सिख, ईसाई, बौद्ध, जैन एवं फारसी अल्पसंख्यक हैं, जिनमें मुस्लिम सबसे बड़ा अल्पसंख्यक समुदाय है| इस अध्याय में हम अल्पसंख्यक से सम्बंधित निम्न विन्दुओं की चर्चा करेंगे l

  1. 2011 की जनगणना के अनुसार विभिन्न धर्मों के जनसंख्या की स्थिति
  2. भारत में मुस्लिम अल्पसंख्यकों की समस्याएँ
  3. भारत में अल्पसंख्यकों की समस्या दूर करने के सुझाव
  4. अल्पसंख्यको के लिए सरकार द्वारा उठाए गए कदम
  5. अल्पसंख्यक आयोग
  6. भारत में भाषा पर आधारित अल्पसंख्यक
  7. जनजातीय अल्पसंख्यक
  8. भारत में जनजातियों की समस्या
  9. अनुसूचित जनजातियों के लिए संवैधानिक प्रावधान

2011 की जनगणना के अनुसार विभिन्न धर्मों के जनसंख्या की स्थिति

हिंदू – 79.8 %
मुस्लिम – 14.2 %
ईसाई – 2.3 %
सिक्ख – 1.7 %
बौद्ध. – 0.7%
जैन – 0.4%

राज्यवार अगर हम देखें तो सबसे अधिक हिंदू जनसंख्या प्रतिशत हिमाचल प्रदेश (95.17%) एवं सबसे कम मिजोरम (2.75%) में है |

सबसे अधिक मुस्लिम जनसंख्या प्रतिशत वाला राज्य/केंद्र शासित प्रदेश – लक्षद्वीप (96.58%) , जम्मू एवं कश्मीर (68.31%) है|

सर्वाधिक ईसाई जनसंख्या प्रतिशत वाला राज्य – नागालैंड( 87.93%) है|

इसी तरह सिक्खों की सबसे अधिक जनसंख्या प्रतिशत पंजाब में, बौद्धों की सिक्किम में एवं जैन की महाराष्ट्र में है|

इस तरह हम देखते हैं कि जो धर्म एक राज्य में बहुसंख्यक है वही दूसरे राज्य में अल्पसंख्यक है|

रजनी कोठारी अपनी पुस्तक कम्यूनलिज्म इन इंडियन पॉलिटिक्स (Communalism in Indian Politics) में विचार व्यक्त करते हैं कि बहुसंख्यक एवं अल्पसंख्यक के बँटवारे ने ही भारत में अन्तरधार्मिक संचार को विकृत किया है| बहुसंख्यक की अवधारणा पूरी तरह दोषपूर्ण है| भारत में केवल ईसाई, मुस्लिम ही अल्पसंख्यक नहीं बल्कि इसमें जनजाति एवं हिंदुओं के हिस्से भी शामिल हैं|

भारत में मुस्लिम अल्पसंख्यकों की समस्याएँ –

(1) सांप्रदायिक दंगे

(2) बेरोजगारी

(3) आधुनिकीकरण एवं शिक्षा का अभाव

(4) अधिक जनसंख्या

(5) असुरक्षा का भाव

(6) आर्थिक पिछड़ापन

(7) अलगाववाद की समस्या

(8) समान सिविल संहिता (Common Civil Code) की समस्य

भारत में अल्पसंख्यकों की समस्या दूर करने के सुझाव –

(1) संवैधानिक दायरे में रहकर इनकी सामाजिक, आर्थिक एवं शैक्षणिक स्थिति में सुधार का प्रयास किया जाय|

(2) मदरसों का आधुनिकीकरण किया जाय, जिसमें रोजगारमूलक शिक्षा भी शामिल हो|

(3) ऐसे संगठन जो आरोप-प्रत्यारोप के द्वारा नफरत फैलाते हैं उन पर कठोरता पूर्वक अंकुश लगाया जाय|

अल्पसंख्यको के लिए सरकार द्वारा उठाए गए कदम

(1) भारतीय संविधान का अनुच्छेद 15 (1) एवं (2) धर्म के आधार पर किसी भी तरह के भेदभाव कर रोक लगाता है|

(2) अनुच्छेद 29 – अल्पसंख्यक वर्ग को भाषा लिपि एवं संस्कृति को बनाए रखने का अधिकार है|

(3) अनुछेद 30 – अल्पसंख्यक वर्ग को अपनी रुचि के अनुसार शिक्षण संस्थाओं की स्थापना का अधिकार है|

(4) सन् 2005 में अल्पसंख्यक के कल्याण के लिए प्रधानमंत्री द्वारा 15 सूत्री (15 Points) कार्यक्रम शुरू किया गया जिसमें शिक्षा के अवसर में बढ़ावा देने से लेकर स्वरोजगार तक की योजनाएं शामिल हैं|

(5) अल्पसंख्यक आयोग –

अल्पसंख्यक आयोग के गठन के लिए 1978 में गृह मंत्रालय ने एक प्रस्ताव पास किया था, लेकिन सन् के राष्ट्रीय अल्पसंख्यक अधिनियम में इसे वैधानिक दर्जा दिया गया एवं 1993 में पहला वैधानिक राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग का गठन किया गया| जिसमें पाँच समुदाय मुस्लिम, ईसाई, सिख, बौद्ध एवं पारसी को अल्पसंख्यक माना गया| सन् 2014 में जैन समुदाय को भी इसमें शामिल कर लिया गया|

अल्पसंख्यक आयोग के कार्य

(1) अल्पसंख्यकों के विकास का मूल्यांकन करना|

(2) कानून एवं संविधान द्वारा अल्पसंख्यकों को प्राप्त सुरक्षा की मॉनिटरिंग एवं संबंधित अनुशंसा करना|

(3) अल्पसंख्यकों के साथ हो रहे भेदभाव का अध्ययन एवं इसे दूर करने की अनुशंसा करना|

(4) कोई मामला, जिसे केंद्र सरकार आयोग को सुपुर्द करे|

भारत में भाषा पर आधारित अल्पसंख्यक –

भारतीय संविधान की आठवी अनुसूची में 22 भाषाओं का उल्लेख हैं| भारत में भाषा के आधार पर अल्पसंख्यक की सामान्यतः कोई समस्या नहीं है इतना अवश्य है कि अधिक बोलीे जाने वाली भाषा हिंदी जिसकी मातृभाषा है उसे अन्य राज्यों में जाने पर किसी से वार्तालाप में कोई समस्या नहीं होती है|


भारत में सबसे अधिक हिंदी भाषा लोगों के द्वारा बोली जाती है जबकि सबसे कम संस्कृत भाषा का प्रयोग किया जाता है, जिसे 2011 की जनगणना के अनुसार निम्नवत् देखा जा सकता है|

भाषा बोलने वालों की कुल जनसंख्या जनसंख्या का प्रतिशत

हिंदी  – 52,83,47,193 (43.63%)

बंगाली  – 9,72,37,669 (8.03%)

मराठी  – 8,30,26,680 (6.86%)

तेलुगु  – 8,11,27,74 (6.70%)

स्वतंत्रता के पश्चात भारतीय संविधान में हिंदी को राष्ट्रभाषा के रूप में स्वीकार किया गया| भाषायी आधार पर पृथक होने वाला भारत का पहला राज्य आंध्र प्रदेश है, जो 1953 में अलग हुआ था|

भारतीय संविधान के अनुच्छेद 350-क के अंतर्गत प्रत्येक राज्य भाषायी अल्पसंख्यकों के बालकों के लिए शिक्षा के प्राथमिक स्तर पर मातृभाषा में शिक्षा की पर्याप्त सुविधाओं की व्यवस्था का प्रयास करेगा है|

जनजातीय अल्पसंख्यक –

जनजाति एक क्षेत्रीय समुदाय है| संवैधानिक शब्दावली में इसे अनुसूचित जनजाति कहते हैं| ये अपनी अधिकांश आवश्यकता की पूर्ति के लिए वनों पर निर्भर रहते हैं| इनका क्षेत्र नातेदारी तक सीमित होता है| यह समाज में सबसे अलग रहते हैं| अलगाव के कारण समाज की मुख्यधारा से कटे रहते हैं, परिणाम स्वरूप बहुत पिछड़ापन दिखायी देता है| 2011 की जनगणना के अनुसार जनजातियों की संख्या भारत की कुल जनसंख्या का 8.6% हैं|

भारत में जनजातियों की समस्या –

भारतीय संविधान में जनजातियों की कोई परिभाषा नहीं दी गई है, बल्कि राष्ट्रपति को यह अधिकार है कि वे अनुसूचित जनजाति आयोग की संस्तुति पर किसी भी समुदाय को अनुसूचित जनजाति घोषित कर सकते हैं|

डी. एन. मजूमदार (D. N. Mazumdar) के अनुसार जनजाति परिवारों का एक समूह होता है, जिसके सदस्य एक ही भाषा का प्रयोग करते हैं, एक ही क्षेत्र में निवास करते हैं, विवाह तथा पेशा से संबंधित सामान्य निषेध का पालन करते हैं तथा उनके बीच सुविकसित पारस्परिक विनिमय तथा आपसी लेनदेन की व्यवस्था पायी जाती है|

जनजातियाँ इतनी पिछड़ी हैं कि विवाह संबंधी जानकारी की शिक्षा प्रदान करने के लिए इनमें युवा गृह (Youth Dormitory) पाया जाता है|

एल.पी. विद्यार्थी ने जनजातियों के दो प्रकार की समस्या की चर्चा की

(1) स्वजनित समस्याएँ

(2) बाहरी कारणों से उत्पन्न समस्याएँ

चूँकि भारत में जनजातियों की सामाजिक, आर्थिक एवं भौगोलिक स्थिति सभी जगह समान नहीं है| अतः इनकी समस्याएं भी भिन्न-भिन्न है| वे जनजातियाँ जो स्थानांतरित कृषि करती हैं, उन्हें जीविकोपार्जन, गरीबी, भुखमरी, असभ्य जीवनशैली की समस्याएँ हैं एवं समाज की मुख्यधारा में शामिल नहीं है| जबकि जो कृषक जनजातियाँ हैं उन्हें विकास से जुड़ने एवं नई तकनीक के ग्रहण की समस्या है| अण्डमान एवं निकोबार की जनजातियों जैसे – जारवा, सेंटलीज, ओन्जे आदि में जनसंख्या ह्रास की समस्या है| फिर भी जनजातियों की सामान्य समस्याओं को निम्नवत् देखा जा सकता है –

(1) शिक्षा की समस्या

(2) आर्थिक दृष्टि से दीन-हीन स्थित होती है

(3) सामाजिक संपर्क से अस्मिता का खतरा रहता है

(4) स्वास्थ्य संबंधी समस्याएँ रहती हैं

(5) शिक्षा, तकनीक की अनुपलब्धता रहती है

(6) समाज के साथ एकीकरण में समस्या रहती है

(7) अधिकार एवं कर्तव्य के प्रति अचेतन हैं

(8) पर-संस्कृतिग्रहण की समस्या

(9) अन्य क्षेत्रों के संपर्क में आने से शोषण की समस्या

अनुसूचित जनजातियों के लिए संवैधानिक प्रावधान –

(1) संविधान के अनुच्छेद 338-क के अंतर्गत अनुसूचित जनजाति आयोग के गठन का प्रावधान किया गया है|

(2) संविधान की पाँचवी अनुसूची (5th Schedule) में अनुसूचित क्षेत्रों और अनुसूचित जनजातियों के प्रशासन और नियंत्रण के बारे में उपबंध है|

(3) संविधान की छठवीं अनुसूची (6th Schedule) में असम, मेघालय, त्रिपुरा और मिजोरम राज्यों के जनजाति क्षेत्रों के प्रशासन के बारे में उपबंध है|

(4) अनुच्छेद 330 में लोकसभा में अनुसूचित जनजातियों के लिए स्थानों का आरक्षण है|

(5) अनुच्छेद 332 में राज्यों की विधानसभाओं में अनुसूचित जनजातियों के लिए आरक्षण का प्रावधान है|

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