जातिवाद (Casteism) – कारण l स्वरुप – मनोवैज्ञानिक एवं व्यावहारिक, दुष्परिणाम, निवारण के उपाय

जातिवाद के इस अध्याय के अंतर्गत हम निम्न विन्दुओं पर चर्चा करेंगे –

  1. जातिवाद क्या है
  2. जातिवाद के कारण
  3. जातिवाद का स्वरूप
  4. जातिवाद के दुष्परिणाम
  5. जातिवाद के निवारण के उपाय

जातिवाद क्या है

समाज में सामान्यत: सभी जातियों के लोग रहते हैं एवं प्रत्येक जाति समाज की एकरूपता बनाए रखने में योगदान देती है| लेकिन जातिवाद वह संकुचित भावना है जो अपनी ही जाति के सदस्यों के हितों को बढ़ावा देती है l अपनी ही जाति की सामाजिक स्थिति को उच्च करने तक सीमित हो जाती हैं तथा अन्य जातियों के हितों को नजरन्दाज करती है|

डॉ. के.एन. शर्मा के अनुसार जातिवाद या जातिभक्ति एक ही जाति के व्यक्तियों की वह भावना है जो देश की या समाज के सामान्य हितों को ध्यान में न रखते हुए केवल अपनी जाति के सदस्यों के उत्थान, जातीय एकता और जाति की सामाजिक प्रस्थिति को दृढ़ करने के लिए प्रेरित करती हो|

डॉ. एन. प्रसाद की मान्यता है कि जातिवाद राजनीतिकता में रूपांतरित एक जाति के प्रति निष्ठा है|

के.एम. पणिक्कर के अनुसार राजनीतिक भाषा में उप-जाति के प्रति निष्ठा का भाव ही जातिवाद है|

जातिवाद के कारण (Causes of Casteism) –

(1) विवाह संबंधी प्रतिबन्ध –
                                     जाति प्रथा अपनी ही जाति एवं उप-जाति के भीतर विवाह की अनुमति देता है| परिणामस्वरूप प्रत्येक उप-जाति एक स्वः केंद्रित समूह बन गया है और किसी भी स्थिति में अपनी ही उप-जातीय समूह का पक्ष लेने लगी है|

(2) प्रचार एवं यातायात के साधनो में वृद्धि –
                                                        प्रचार और यातायात के साधनों ने भी जातिवाद के विकास में योगदान दिया है| देश के दूर-दराज स्थानों पर बसे लोग यातायात साधनों के कारण एक दूसरे के संपर्क में तेजी से आने लगे हैं, संचार साधनों ने इसे और भी बढ़ा दिया है| लोग जातीय सम्मेलन में भाग लेने लगे हैं एवं अपने ही जातीय हितों के प्रति लामबंद होने लगे हैं|

(3) जजमानी प्रथा का अंत –
                                      जजमानी प्रथा के कारण प्रत्येक उप-जाति के लोग एक दूसरे से भावनात्मक रूप से जुड़े रहते थे एवं सहयोगी भावना रखते थे| जजमानी प्रथा के अंत के बाद प्रत्येक उप-जाति अपने जातीय हितों को ही पोषित करती हुई दिखायी देती है|

(4) आरक्षण –
                    जातियों का असमान विकास होने के कारण सरकार द्वारा कुछ उप-जातीय समूहों को विशेष प्रावधान के साथ आरक्षण प्रदान किया गया है| जिसके परिणामस्वरूप विभिन्न जातियों के बीच द्वेष बढ़ा है एवं अपने जातीय हितों के प्रति लोग अधिक सजग हुए हैं|

(5) राजनीति –
                    वोट बैंक की राजनीति के कारण भी राजनीतिज्ञ जातियों का ध्रुवीकरण करते हैं| जाति के आधार पर ही वोट मांगते हैं एवं जातियों के हितों को पोषित करते हैं| इसे ही राजनीति का जातीयकरण करते हैं|

जातिवाद का स्वरूप –

(1) मनोवैज्ञानिक स्वरूप –
                                   यह एक जातीय भावना है, जिससे प्रेरित होकर एक व्यक्ति अपने ही जातीय हितों को सर्वोपरि समझता है एवं उसी के कल्याण के लिए सोचता है तथा अन्य जातियों के हितों को नजरन्दाज करता है|

(2) व्यावहारिक स्वरूप –
                                   यह मनोवैज्ञानिक स्वरूप के बाद का चरण है| इसमें व्यक्ति न केवल अपने जातीय हितों के बारे में सोचता है, बल्कि उचित-अनुचित की परवाह किए बिना जातीय हितों के लिए कार्य करता है, जैसे – अपनी ही जाति के उम्मीदवार को वोट देना, सरकारी पद पर आसीन होने पर अपनी ही जाति के लोगों के लिए पक्षपात करना आदि|

जातिवाद के दुष्परिणाम –

(1) जातिवाद राष्ट्रीय एकता में बाधक है|

(2) जातिवाद की संकीर्ण मानसिकता के कारण लोगों का नैतिक पतन हो जाता है|

(3) जातिवाद की धारणा प्रजातांत्रिक मूल्यों के विपरीत है|

(4) जातिवाद ने आपसी संघर्ष को बढ़ावा दिया है|

(5) जातिवाद के कारण समाज विघटन का शिकार हो जाता है|

(6) जातिवाद ने स्वच्छ राजनीति को ही दूषित किया है|

जातिवाद के निवारण के उपाय –

(1) पेशे के चुनाव में पूर्ण स्वतंत्रता हो|

(2) राजनीति में जातिगत आधार पर प्रचार-प्रसार पर प्रतिबंध हो|

(3) जातिगत आधार पर आवास, हॉस्टल आदि को समाप्त किया जाय|

(4) जातीय शब्दों का कम से कम प्रयोग हो|

(5) अंतर्जातीय विवाहों को सामाजिक रूप से मान्यता मिले|

(6) सभी सदस्यों में सामाजिक एकता की भावना विकसित करने का प्रयास किया जाय|

Leave a Comment

error: