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समाजीकरण (Socialization)


समाजीकरण क्या हैमानव शिशु जब जन्म लेता है तो वह लोगों के साथ कैसे व्यवहार करे, इसके प्रति अचेतन रहता है| किंतु सीखने की क्षमता से युक्त होता है| अतः वह सामाजिक सम्पर्क द्वारा समाज की संस्कृति, मूल्यों, प्रतिमानों, विश्वासों, प्रथाओं आदि गुणों को सीखता है| सीखने की इसी प्रक्रिया को समाजीकरण कहते हैं| इस तरह समाजीकरण सीखने की एक प्रक्रिया है जिसके द्वारा शिशु या व्यक्ति सामाजिक मूल्यों एवम् प्रतिमानों को सीखता है एवं जिसका परिणाम सामाजिक- सांस्कृतिक प्राणी के रूप में होता है| समाजीकरण के इस अध्याय में हम निम्न विन्दुओं की चर्चा करेंगे|

  1. समाजीकरण की विशेषताएं
  2. समाजीकरण के उद्देश्य
  3. समाजीकरण की प्रक्रिया
  4. हैरी एम.जॉनसन द्वारा उल्लिखित समाजीकरण के चार स्तर

ग्रीन के अनुसार समाजीकरण वह प्रक्रिया है, जिसके द्वारा बच्चा सांस्कृतिक विशेषताओं, आत्मपन और व्यक्तित्त्व को प्राप्त करता है| (Socialization is the process by which the child acquires a cultural content alongwith selfhood and personality)

जॉनसन के अनुसार समाजीकरण एक सीख है जो सीखने वाले को सामाजिक भूमिका का निर्वाह करने के योग्य बनाती है| (Socialization is learning that enables the learner to perform social roles.)

चूँकि समाजीकरण का संबंध व्यक्ति एवं समाज के बीच के संबंधों से है| अतः इस अर्थ में यह अवधारणा समाजशास्त्र एवं मनोविज्ञान के बीच सेतु (Bridge) का काम करती है|

एस.सी. दूबे (S.C.Dube) के अनुसार समाजशास्त्र समाज के संदर्भ में जिस प्रक्रिया को समाजीकरण कहता है, संस्कृति के संदर्भ में मानवशास्त्र उसे स्वसंस्कृतिग्रहण (Inculturation) कहता है|

चूँकि मनुष्य में जन्मजात विशेषताओं (Instinct) का अभाव पाया जाता है, इसलिए वह समाजीकरण के माध्यम से ही समाज के बारे में सीखता है एवं उसी के अनुरूप व्यवहार करता है| समाज से पृथक रहे बच्चों जैसे – कमला और अमला, जिनी, अन्ना, इजाबेला, रामू, कास्पर हाउसर के उदाहरण इस बात की पुष्टि करते हैं कि मानव शिशु में मूल प्रवृत्ति (Instinct) नहीं पाई जाती| जो कुछ भी पाया जाता है वह समाजीकरण का परिणाम होता है| इसलिए समाजीकरण के लिए सामाजिक सम्पर्क अर्थात् अन्तःक्रिया का होना आवश्यक है| सामाजिक सम्पर्क प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष, चेतन या अचेतन कुछ भी हो सकता है| सामाजिक सम्पर्क का स्वाभाविक परिणाम समाजीकरण में होता है|

समाजीकरण की विशेषताएं (Characteristics of Socialization)

(1) यह सीखने की प्रक्रिया है| (Process of Learning)

(2) यह जीवन पर्यन्त चलने वाली प्रक्रिया है| (Life-long Process)

(3) यह अपने संस्कृति को आत्मसात् करने की प्रक्रिया है| (Process of assimilating one’s own culture)

(4) यह एक गत्यात्मक प्रक्रिया है| (A dynamic process)

(5) समय एवं स्थान के सापेक्ष है| (Process related to time and space)

(6) समाज का प्रकार्यात्मक सदस्य बनने की प्रक्रिया है| (Process of making a functional member of society)

समाजीकरण के उद्देश्य

(1) बच्चों को अनुशासन का पाठ पढ़ाना|

(2) प्रत्येक व्यक्ति में प्रेरणा उत्पन्न करना|

(3) सामाजिक भूमिका से अवगत कराना|

(4) व्यवहारों में अनुरूपता लाना|

समाजीकरण की प्रक्रिया अथवा स्तर (Process or Stages of Socialization)

1 – मौखिक अवस्था (Oral Stage)

यह समाजीकरण का प्रथम स्तर है| इस स्तर पर बच्चा अपने माँ के अतिरिक्त किसी को नहीं जानता| बच्चे की आयु एक से डेढ़ वर्ष तक होती है| बच्चा अपने भोजन के प्रति अपेक्षाएँ रखने लगता है तथा अपने भूख, कष्ट आदि को रोकर माँ के सामने व्यक्त करता है|

2 – शैशव अवस्था (Anal Stage)

यह अवस्था डेढ़-दो वर्ष से प्रारम्भ होकर तीन-चार वर्ष की आयु तक चलती है| इस अवस्था में बच्चे से यह आशा की जाती है कि वह स्वयं को थोड़ा संभाले| बच्चे को यह सिखाया जाता है कि उसे कब और कहाँ शौंच करना चाहिए तथा हाथ साफ करना, कपड़े गंदे न करना आदि सिखाया जाता है| बच्चे को सही एवं गलत में भेद करना सिखाया जाता है| सही कार्य पर स्नेह एवं गलत कार्य पर बच्चे को डाँट पड़ती है|

3 – तादात्मीकरण की अवस्था (Identification Stage)

यह अवस्था 4 वर्ष की आयु से प्रारम्भ होकर 12-13 वर्ष की आयु तक चलती है| इस अवस्था में बच्चे से यह अपेक्षा की जाती है कि वह लिंग के अनुसार अपने को ढ़ाले तथा पारिवारिक नियमों के अनुसार व्यवहार करें| इस अवस्था में बालक पुत्र या पुत्री, भाई या बहन, मित्र या सहपाठी के रूप में अपनी भूमिका निभाता है| दूसरों के साथ अंतःक्रिया करते हुए बालक में सहयोग, लगाव, प्रेम, विरोध आदि भावनाओं का विकास होता है|

4 – किशोरावस्था (Adolescene Stage)

यह अवस्था लगभग 13-14 वर्ष, प्राय: यौवनारम्भ के समय शुरू होता है| इस अवस्था में बच्चे के शरीर में कुछ शारीरिक परिवर्तन स्पष्ट होने लगते हैं| वह अपने परिवार के अतिरिक्त पड़ोस, स्कूल, खेल-कूद साथियों, सहपाठियों आदि नये-नये लोगों के संपर्क में आता है| इस अवस्था में बच्चे को अपनी संस्कृति से संबंधित निषेधों एवं यौन संबंधी निषेधों का पालन करना पड़ता है| बच्चे में यौन संबंधी भावनाएं भी विकसित होने लगती है| इसलिए बच्चे को  इच्छाओं का दमन, समाज की मर्यादाओं, शिष्टाचार, विचारों को व्यक्त करने का ढंग आदि का प्रशिक्षण दिया जाता है| इससे बच्चे में आत्म-नियंत्रण की क्षमता विकसित होती है|

5 – वयस्क अवस्था (Adulthood)

इस अवस्था में व्यक्ति का सामाजिक, आर्थिक पर्यावरण तेजी से बदलने लगता है| विवाह के कारण व्यक्ति की प्रस्थिति बदलती है एवं सामाजिक दायित्त्व बढ़ जाता है| इस अवस्था में व्यक्ति को पिता, पुत्र, पति, मित्र, अधिकारी, कर्मचारी आदि के रूप में अपनी भूमिका का निर्वहन करना पड़ता है|

6 – वृद्धावस्था (Old Age)

इस अवस्था में सामाजिक, शारीरिक, मानसिक अनेक परिवर्तन आ जाते हैं| परिवार में नाना या नानी दादा या दादी आदि की प्रस्थिति प्राप्त होती है| शारीरिक एवं मानसिक शिथिलता के कारण सामाजिक सम्पर्क बहुत कम हो जाता है| इसलिए नये विचारों का समावेश नहीं हो पाता| अतः विचारों एवं व्यवहारों में कोई परिवर्तन नहीं कर पाता| यही कारण है कि इस अवस्था में नई पीढ़ी के साथ तनाव एवं जनरेशन गैप दिखाई देता है|

 हैरी एम.जॉनसन (Harry M. Johnson) ने समाजीकरण के चार स्तरों की चर्चा की| इनकी व्याख्या का संदर्भ अमेरिका है –

(1) मौखिक अवस्था (Oral Stage) – यह जन्म से लेकर 1 वर्ष की आयु तक होता है|

(2) शैशव अवस्था (Anal Stage) – यह अवस्था 1 वर्ष से लेकर 3 वर्ष की आयु तक होता है|

(3) इडिपस (Oedipal Stage and Latency) – यह अवस्था 4 वर्ष से लेकर 12-13 वर्ष की आयु तक होता है|

(4) किशोरावस्था (Aldolescene) – यह अवस्था 12 वर्ष से लेकर वयस्क अवस्था तक होती है|


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