सामाजिक विघटन (Social Dis-organisation)

इस अध्याय के अंतर्गत हम निम्न विन्दुओं की चर्चा करेंगे –

  1. सामाजिक विघटन क्या है

2. सामाजिक विघटन की अवधारणा

3. सामाजिक विघटन के कारक

4. सामाजिक विघटन के लक्षण

5. सामाजिक विघटन के दुष्प्रभाव

6. सामाजिक संगठन एवं सामाजिक विघटन में अंतर

सामाजिक विघटन क्या है –

सामाजिक विघटन समाज, समुदाय या समूह की उस स्थिति को व्यक्त करता है जब सामाजिक समस्याएं जैसे – अपराध, बाल-अपराध, मद्यपान, हत्या, आत्महत्या आदि घटनाओं में बेतहाशा वृद्धि हो रही हो|

 सामाजिक विघटन की अवधारणा –

 सामाजिक विघटन एक सापेक्षिक अवधारणा है| इसे समझने के लिए सामाजिक संगठन को समझना आवश्यक है| समाज में जब सामाजिक नियंत्रण की संस्थाएं प्रभावी रूप से कार्य करती हैं तो मनुष्य का व्यवहार मर्यादित एवं कल्याणकारी आचरणों से युक्त होता है, जिससे समाज में संतुलन बना रहता है| इसे ही हम सामाजिक संगठन कहते हैं| लेकिन जहाँ सामाजिक नियंत्रण की संस्थाएं शिथिल या कमजोर होती है, वहाँ अपने आप सामाजिक विघटन प्रारम्भ हो जाता है|


 इलियट एवं मेरिल (Elliott and Merrill) अपनी पुस्तक सोशल डिसऑर्गनाइजेशन (Social Disorganisation) में लिखते हैं कि सामाजिक विघटन एक प्रक्रिया है जिसके द्वारा एक समूह के सदस्यों के बीच संबंध टूट जाते हैं या समाप्त हो जाते हैं|

लीमर्ट के अनुसार सामाजिक संस्थाओं एवं समूहों के बीच असंतुलन तथा व्यापक संघर्ष पैदा होना, सामाजिक विघटन है| 


सामाजिक विघटन के कारक (Factors of Social Dis-organisation) –


(1) सामाजिक परिवर्तन –

तीब्र सामाजिक परिवर्तन के कारण लोग जब नवीन परिस्थितियों से अनुकूलन नहीं कर पाते, तो सामाजिक विघटन प्रारम्भ को जाता है|


(2) संस्कृति एवं अानुवंशिकता में कुसमायोजन –

जब मनुष्य की अानुवंशिकता का तालमेल प्रकृति एवं संस्कृति से नहीं हो पाता है तो सामाजिक विघटन प्रारम्भ हो जाता है|


(3) औद्योगीकरण –

औद्योगीकरण ने पूँजीवाद, शोषण तथा वर्ग संघर्ष को जन्म दिया, इसने बेरोजगारी, अपराध, अनैतिकता, सामाजिक विघटन जैसी समस्याओं में वृद्धि की है|


(4) प्राकृतिक आपदाएँ

बाढ़, सूखा, भूकम्प जैसी प्राकृतिक आपदाएँ सामूहिक जीवन की दशा को प्रतिकूल कर देती है, जिससे मानवीय संबंध नकारात्मक रूप से प्रभावित होता है, जो सामाजिक विघटन को जन्म देता है|


(5) सांस्कृतिक विलम्बना –

अॉगबर्न के अनुसार संस्कृति के विभिन्न पक्षों (भौतिक एवम् अभौतिक) में असमान परिवर्तन होता है, जिससे संस्कृति के विभिन्न पक्षों में असंतुलन पैदा हो जाता है जो सामाजिक विघटन को जन्म देता है|


(6) सामाजिक प्रतिमानों का उलंघन –

थॉमस एवं नैनिकी के अनुसार जब समाज के नियम व्यक्तियों को नियंत्रित करने में असफल हो जाते हैं तो सामाजिक विघटन प्रारंभ हो जाता है|


(7) श्रम विभाजन –

दुर्खीम के अनुसार श्रम विभाजन सामान्य रूप से सामाजिक एकता की स्थापना करता है| लेकिन श्रम का अति-विभाजन सामाजिक एकता को कमजोर करता है एवं सामाजिक विघटन को जन्म देता है|


सामाजिक विघटन के लक्षण (Symtoms of Social Disorganisation) –


(1) लोगों में भूमिका संघर्ष का होना|
(2) समाज में हताशा व्याप्त होना|
(3) सामाजिक संस्थाओं जैसे – प्रथाओं, लोकाचारों का नवीन मूल्यों से संघर्ष का होना|
(4) सामूहिक मूल्यों एवम् प्रतिमानों का कम होना|
(5) समाज को नियंत्रित करने वाले नियमों एवं संस्थाओं के प्रभाव का कम होना|
(6) तीव्र सामाजिक परिवर्तन का होना|
(7) सामाजिक समस्याएं जैसे – गरीबी, भुखमरी, बेकारी, हत्या, आत्महत्या, भ्रष्टाचार आदि में बेतहाशा वृद्धि होना|


सामाजिक विघटन के दुष्प्रभाव (Evil Effects of Social Disorganization) –


(1) सामूहिक जीवन का ह्रास होता है|
(2) समाज में असमंजस की स्थिति रहती है|
(3) समाज में भ्रष्टाचार एवं अनैतिकता व्याप्त रहता है|
(4) व्यक्तिगत, पारिवारिक एवं सामुदायिक विघटन होता है|
(5) सामाजिक जीवन अस्त-व्यस्त हो जाता है|
(6) अपराध, बाल-अपराध, वेश्यावृत्ति, मद्यपान जैसी घटनाएँ सामने आती हैं|


सामाजिक संगठन एवं सामाजिक विघटन में अंतर (Difference between Social Organisation and Social Dis-organisation) –

सामाजिक संगठन की स्थिति में समाज या समुदाय, शांति, सहयोग, साझे-मूल्य, एकता, अनुशासन तथा प्रत्याशित व्यवहार को व्यक्त करता है, इसके विपरीत यदि भूमिका-संघर्ष, अप्रतिमानिता (Normlessness), सामाजिक संघर्ष तथा हताशा से उत्पन्न अनैतिकता उपस्थिति हो तो उसे हम सामाजिक विघटन कहेंगे|


(1) सामाजिक संगठन में सदस्यों के बीच वैचारिक सहमति पायी जाती है, जबकि सामाजिक विघटन में वैचारिक सहमति का अभाव होता है|
(2) सामाजिक संगठन की स्थिति में सदस्यों के बीच सामंजस्यपूर्ण संबंध रहता है, जबकि सामाजिक विघटन में संबंध तनावपूर्ण रहते है|
(3) सामाजिक संगठन में सामाजिक नियमों, आदर्शों का पालन किया जाता है जबकि सामाजिक विघटन के दौरान इसका उलंघन होता है|
(4) सामाजिक संगठन सामाजिक व्यवस्था का द्योतक है जबकि सामाजिक विघटन सामाजिक अव्यवस्था का द्योतक है|
(5) सामाजिक संगठन में सामाजिक नियंत्रण के अभिकरण एवं साधन कार्यरत रहते हैं जबकि सामाजिक में विघटन में सामाजिक नियंत्रण शिथिल हो जाता है|
(6) सामाजिक संगठन में समाज प्रगति की ओर उन्मुख होता है जबकि सामाजिक विघटन में पतन की ओर उन्मुख होता है|

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