निर्धनता (Poverty)


निर्धनता या गरीबी वह स्थिति है जिसमें व्यक्ति अपनी तथा अपने पर आश्रित सदस्यों की आवश्यकता की पूर्ति धन के अभाव के कारण नहीं कर पाता है| जिसके कारण उसके परिवार को जीवन की न्यूनतम आवश्यकता जैसे रोटी, कपड़ा, मकान भी उपलब्ध नहीं हो पाता| दूसरे शब्दों में कहें तो समाज का वह व्यक्ति जो अपनी बुनियादी आवश्यकताआों जैसे – भोजन, वस्त्र, आवास को पूरा करने में असमर्थ होता है गरीब कहा जाता है|

गिलिन एवं गिलिन (Gillin and Gillin) के अनुसार निर्धनता वह दशा है जिसमें एक व्यक्ति अपर्याप्त आय या विचारहीन व्यय के कारण अपने जीवन स्तर को इतना ऊँचा नहीं रख पाता, जिससे उसकी शारीरिक एवं मानसिक कुशलता बनी रहे और वह तथा उसके आश्रित समाज के स्तर के अनुसार जीवन व्यतीत कर सकें|

गोडार्ड (Goddard) के अनुसार निर्धनता उन वस्तुओं का अभाव या अपर्याप्त पूर्ति है जो एक व्यक्ति तथा उसके आश्रितों के स्वास्थ्य और कुशलता को बनाए रखने के लिए आवश्यक है|

भारत में ग्रामीण क्षेत्रों में 2400 कैलोरी प्रति व्यक्ति प्रतिदिन तथा शहरी क्षेत्रों में 2100 कैलोरी प्रति व्यक्ति प्रतिदिन से कम उपभोग को गरीब माना गया है|

रंगराजन समिति, जिसमें उपभोग खर्च (Consumption Expenditure) को गरीबी का आधार बनाया गया, के अनुसार 2011-12 में भारत में कुल 363 मिलियन लोग गरीब हैं, जो भारत की कुल आबादी का 29.6% है| जबकि सुरेश तेंदुलकर समिति के अनुसार भारत में गरीबी 21.9% है|

रंगराजन समिति ने ग्रामीण क्षेत्रों में 32 रुपये एवं शहरी क्षेत्रों में 47 रुपए प्रतिदिन प्रति व्यक्ति उपभोग (Daily Per Capita Expenditure) को गरीबी रेखा निर्धारित किया था अर्थात् इससे कम उपभोग करने वाला व्यक्ति गरीब है, जो औसत मासिक रूप में ग्रामीण क्षेत्र में 972 रुपये तथा शहरी क्षेत्रों में 1407 रुपए प्रति व्यक्ति है|

सापेक्ष एवं निरपेक्ष निर्धनता (Relative and absolute poverty)

निरपेक्ष रूप से उन लोगों को गरीब कहा जाता है जिनको निर्वाह की न्यूनतम आवश्यकताएँ जैसे – भोजन, आवास, वस्त्र भी प्राप्त नहीं हो पाता है|
सापेक्ष निर्धनता का तात्पर्य एक व्यक्ति के पास सापेक्षिक रूप से दूसरे व्यक्तियों से कम धन एवं संपदा के होने से है, जैसे निम्न वर्ग, मध्यम वर्ग से एवं मध्यम वर्ग, उच्च वर्ग से सापेक्षिक रूप से निर्धन है|

भारत में निर्धनता के कारण (Causes of Poverty in India)

(1) अधिक जनसंख्या

उत्पादन एवं रोजगार के अवसर की तुलना में जनसंख्या वृद्धि अधिक होती है| अतः कुछ लोगों को बेरोजगार रहना पड़ता है| जो गरीबी के रूप में सामने आता है|

(2) जाति प्रथा

जाति प्रथा के कारण व्यवसाय जन्म के आधार पर निर्धारित हो जाता है| जिससे योग्य होने के बावजूद दूसरा कार्य करना सम्भव नहीं हो पाता या अन्य कार्य करना प्रस्थिति के प्रतिकूल माना जाता है|

(3) कृषि पर अत्यधिक निर्भरता

देश की लगभग 80% जनसंख्या ग्रामीण क्षेत्र में रहती है| जो कृषि पर निर्भर है| कृषि उत्पादन संयुक्त परिवार की आवश्यकता पूर्ति के लिए पर्याप्त नहीं होता| ऐसे में प्राकृतिक आपदा जैसे – सूखा या बाढ़ स्थिति को और दयनीय कर देता है|

(4) कालाबाजारी

किसानों का उत्पाद विचाैलिये के हाथों में जाने से उन्हें अनाज का उचित दाम नहीं मिल पाता है|

(5) अज्ञानता एवं अंधविश्वास

कुछ व्यक्ति गरीबी को ईश्वर का दण्ड समझते है, एवं वे कोई प्रयास नहीं करते हैं| साथ ही धार्मिक कर्मकाण्डओ में अपना संचित धन भी खर्च कर देते हैं|

(6) बेरोजगारी

व्यक्ति कार्य करने के योग्य है फिर भी उसे काम नहीं मिलता| जिससे वह निर्धन बना रहता है|

(7) कृषि क्षेत्र का तकनीकी पिछड़ापन गरीबी का मुख्य कारण है|

(8) प्रतिकूल जलवायु

कुछ स्थानों पर बर्फ बहुत पड़ती है, कुछ जगह रेगिस्तान या पहाड़ है| ऐसे स्थानों पर उत्पादन बहुत कम होता है एवं रोजगार भी नहीं मिलता|

निर्धनता के दुष्प्रभाव या निर्धनता की समस्या

अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन (ILO) के अनुसार निर्धनता कहीं भी सर्वत्र उन्नति के लिए खतरनाक होती है (Poverty anywhere constitutes a danger to prosperity everywhere)

निर्धनता के दुष्प्रभाव को निम्न बिंदुओं में देखा जा सकता है –

(1) जीवन की समस्या

निर्धनता से ग्रस्त व्यक्ति का सामाजिक, आर्थिक एवं मानसिक जीवन अवरुद्ध हो जाता है| अभाव एवं चिंता में व्यक्ति उचित-अनुचित, पाप-पुण्य आदि के बीच भेद करने में असमर्थ हो जाता है|

(2) स्वास्थ्य संबंधी समस्या

निर्धनता के कारण व्यक्ति को समुचित भोजन का अभाव, कुपोषण, आवास की दयनीय दशा का सामना करना पड़ता है| जिसके कारण अशक्तता, बीमारी, विकलांगता, अकाल मृत्यु आदि बातें आम हो जाती हैं| महामारी जैसे चिकनगुनिया, डेंगू आदि अधिकांशतः निर्धन व्यक्ति को ही होते हैं|

(3) भिक्षावृत्ति

निर्धन व्यक्ति को जब आय का कोई अवसर नहीं मिलता है, तो वह भीख माँगने को मजबूर हो जाता है|

(4) बाल श्रम

जिन परिवारों का मुखिया परिवार की मूलभूत आवश्यकता को पूरा करने में सक्षम नहीं होता, उसके घर के बच्चों को भी कार्य करने को मजबूर होना पड़ता है|

(5) अपराध एवं वेश्यावृत्ति

निर्धनता के कारण कुछ व्यक्ति जीविकोपार्जन के लिए अपराध एवं वेश्यावृत्ति को अपना लेते हैं| जिससे उनका नैतिक पतन भी हो जाता है|

(6) पारिवारिक विघटन

निर्धनता के कारण घर में छोटी-छोटी बातों को लेकर झगड़े, मारपीट आदि सामान्य बात हो जाती है, जिससे तलाक, अनैतिक यौन संबंध आदि में लिप्तता होने लगती है एवं परिवार विघटित होने लगता है|

(7) आर्थिक एवं सामाजिक समस्याओं का दुष्चक्र

निर्धनता के कारण समाज में निम्न जीवन स्तर, आर्थिक एवं सामाजिक शोषण तथा संघर्ष की समस्या उत्पन्न होती है, जो स्वयं भी निर्धनता उत्पन्न करती है|

निर्धनता समाप्त करने के लिए सरकार द्वारा किए गए प्रयास

(1) पंचवर्षीय योजनाएँ

यह 1951 में शुरू किया गया जिसमे समाज के हर क्षेत्र के विकास को समाहित किया गया| छठी पंचवर्षीय योजना में तो “गरीबी हटाओ” का नारा भी दिया गया था|

(2) सामुदायिक विकास कार्यक्रम

यह 1952 में शुरू किया गया| इसके अंतर्गत कृषि, पशु प्रबंधन, ग्रामीण और लघु उद्योगों का विकास, स्वास्थ्य तथा सामाजिक शिक्षा बेहतर करके बहुमुखी विकास पर जोर दिया गया|

परन्तु इस योजना का लाभ धनी एवं शक्तिशाली ग्रामीण वर्गों को ही मिल पाया जिससे इस योजना को अपेक्षित सफलता नहीं मिल पायी|

(3) पंचायती राज

बलवंत राय मेहता समिति की सिफारिश पर पंचायती राज की स्थापना की गई| 1993 में इसे संवैधानिक दर्जा दिया गया, तब से लेकर आज तक यह ग्रामीण क्षेत्र में सफलतापूर्वक क्रियाशील है|

(4) अन्य योजनाएँ

1970 के दशक में सामाजिक न्याय पर आधारित विकास को आदर्श माना गया एवं सीमांत किसान, कृषि मजदूर, अनुसूचित जाति एवं जनजाति के लिए एकीकृत ग्रामीण विकास कार्यक्रम (IRDP), जवाहर रोजगार योजना (JRY), स्वरोजगार प्रशिक्षण जैसे कार्यक्रम शुरु किए गये, इससे गरीबी के प्रतिशत में कमी तो आयी, लेकिन जनसंख्या वृद्धि के कारण कुल संख्या में निरंतर वृद्धि होती रही|

(5) हरित क्रांति

1966-67 में शुरू की गयी इस क्रांति से देश खाद्यान्न में आत्म निर्भर हो गया| प्रति व्यक्ति आय में वृद्धि हुई| गरीबी में सुधार, स्वास्थ्य में सुधार, ग्रामीण जीवन स्तर में सुधार हुआ| इससे कृषकों की मानसिकता में नवाचार ग्रहण करने की प्रवृत्ति दिखायी देने लगी|

(6) मनरेगा

निर्धनता में कमी लाने के लिए फरवरी 2006 में इस योजना की शुरुआत की गयी| जिसमें सौ दिन के रोजगार की गारंटी दी गयी है|

निर्धनता दूर करने के सुझाव

(1) जनसंख्या वृद्धि पर प्रभावी नियंत्रण किया जाय|

(2) लोगों को अकादमी शिक्षा के साथ तकनीकी शिक्षा दी जाय|

(3) भ्रष्टाचार पर शून्य सहिष्णुता (Zero tolerance) की नीति अपनायी जाय|

(4) ग्रामीण विकास पर अत्यधिक जोर दिया जाय|

(5) युवाओं को रोजगारपरक शिक्षा मुहैया कराई जाय|

(6) स्वरोजगार के लिए माहौल बनाया जाय|

(7) सामाजिक कुप्रथा जैसे – दहेज पर रोक लगायी जाय|

(8) स्त्री शिक्षा एवं रोजगार को बढ़ावा दिया जाय|

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