समाज का पुनर्निर्माण: कॉम्टे

समाज का पुनर्निर्माण कॉम्टे

समाज का पुनर्निर्माण

कॉम्टे ने यह विचार प्रस्तुत किया की बौद्धिक एवं नैतिक एकता के आधार पर ही समाज का पुनर्निर्माण किया जा सकता है| प्रत्यक्षवादी ज्ञान वह माध्यम है जिसके द्वारा बौद्धिक एवं नैतिक एकता विकसित होगी|

सामाजिक पुनर्निर्माण की आवश्यकता क्यों?

कॉम्टे फ्रांसीसी चिन्तक एवं सामाजिक विचारक थे| वे फ्रांस की तत्कालीन व्यवस्था से पूरी तरह असंतुष्ट थे| फ्रांस में पूंजीवाद का विकास होने से; श्रमिकों का शोषण हो रहा था| इससे अनेक समस्याएँ उत्पन्न हो रही थी| इसके समाधान के रूप में कॉम्टे ने समाज के पुनर्निर्माण के रूपरेखा प्रस्तुत की|

कॉम्टे का मानना था की पूंजीवादी व्यवस्था स्वयं में कोई बुराई नहीं है| अतः इसे समाप्त करना न तो समाज के हित में है; और न ही समस्या का समाधान|

कॉम्टे यह भी मानते हैं कि पूंजी किसके हाथ में है; यह महत्वपूर्ण नहीं है, महत्वपूर्ण यह है की पूंजी का उपयोग जन-साधारण के लिए किया जा रहा है या नहीं|

पूंजीवादी व्यवस्था में जो कुछ दोष है; इसका कारण एक समुचित सामाजिक नीति का अभाव है| इसलिए यह आवश्यक है कि पूंजीपति अपने आर्थिक शक्ति का उपयोग जन-कल्याण के लिए करें| ऐसे कानूनों का निर्माण भी आवश्यक है जो पूंजीपतियों को; श्रमिकों के हित एवं कल्याण के लिए कार्य करने की प्रेरणा दे|

कॉम्टे के अनुसार सामाजिक पुनर्निर्माण की योजना का प्रमुख आधार नैतिकता होगा| नैतिकता के विकास से प्रेम, सहयोग, भाईचारा, न्याय आदि गुण स्वयं उत्पन्न होने लगते हैं|

कॉम्टे आगे लिखते हैं कि नैतिकता के विकास के लिए नैतिक शिक्षा सबसे बड़ा साधन है| “दूसरों के लिए जियो” नैतिकता का मूल आधार होगा| इस तरह एक ऐसी आचार संहिता विकसित होगी; जो प्रत्येक व्यक्ति को अपने कर्तव्यों का बोध कराएगी|

सामाजिक पुनर्निर्माण की योजना

कॉम्टे के अनुसार सामाजिक पुनर्निर्माण की योजना प्रत्यक्षवाद पर आधारित होगी; जो तीन प्रमुख शक्तियों के समन्वय पर आश्रित होगी

(1) ज्ञान Knowledge   (2) क्रिया Action   (3) अनुभूति Feeling

ज्ञान, क्रिया एवं अनुभूति को वे क्रमशः तीन स्वरूपों में व्याख्यायित करते हैं –

1. बौद्धिक शक्ति

सामाजिक पुनर्निर्माण में बौद्धिक शक्ति का प्रमुख स्थान है| यह शक्ति चिंतन पर आधारित है| प्रत्यक्षवादी ज्ञान के आधार पर सामाजिक पुनर्निर्माण की योजनाएं बनायीं जाती है| यह सैद्धांतिक न होकर व्यावहारिक होती है| बौद्धिक शक्ति का उपयोग पारस्परिक सहयोग एवं योजनाओं में समन्वय के लिए किया जाता है|

कॉम्टे ने पुरोहित वर्ग को बौद्धिक शक्ति का प्रतीक माना है| यह पुरोहित वर्ग प्रत्यक्षवादी चिंतन के आधार पर कार्य करेगा, न कि धार्मिक या तात्विक चिंतन के आधार पर|

कॉम्टे आगे लिखते हैं की सामाजिक पुनर्निर्माण में लगे पुरोहित धर्मशास्त्री न होकर समाजशास्त्री होंगे; जो अपने वैज्ञानिक ज्ञान के आधार पर सामाजिक विकास में योगदान देंगे|

कॉम्टे ने पुरोहितों के संख्या का भी निर्धारण किया| उनके अनुसार 10 हजार परिवार पर एक पुरोहित हो तथा सभी पुरोहित सात राष्ट्रिय पुरोहितों के निर्देशन में कार्य करेंगे| जब सम्पूर्ण विश्व में ‘मानवता के धर्म’ के आधार पर समाज का पुनर्निर्माण होने लगेगा तो बिभिन्न देशों के राष्ट्रीय पुरोहितों की संख्या बढ़कर 49 हो जाएगी|

उपरोक्त सभी के ऊपर मानवता के धर्म का एक शीर्ष पुरोहित होगा, जिसका निवास स्थान पेरिस में होगा| ये सभी पुरोहित लोगों को मानवता के धर्म के अनुसार; उत्तरदायित्वों का बोध करने का प्रयास करेंगे|

2. भौतिक शक्ति (Material Force)

सामाजिक पुनर्निर्माण के लिए भौतिक साधनों का होना आवश्यक है| इसका सम्बन्ध उन वर्गों से है; जो भौतिक साधनों के विकास में योगदान देते हैं| इसके अंतर्गत उद्योगपति, व्यापारी, कारीगर एवं कृषक आ जाते हैं|

3. नैतिक शक्ति

कॉम्टे के अनुसार नैतिक शक्ति के विकास के बिना समाज का पुनर्निर्माण संभव नहीं है| नैतिक शक्ति के संचालन की जिम्मेदारी पुरोहितों एवं स्त्रियों की होगी| पुरोहित विश्व में मानवता के धर्म का प्रचार करेंगे; जबकि स्त्रियाँ प्रेम, त्याग, सहानुभूति आदि द्वारा परिवार को नैतिक बनायेंगी|

कॉम्टे आगे लिखते हैं की स्त्रियों को नैतिक शक्ति का उपयोग परिवार तक ही सीमित रखना चाहिए| उनका सामाजिक एवं राजनैतिक क्षेत्र में प्रवेश उचित नहीं है| कॉम्टे ने स्त्रियों को एक ही विवाह करने पर बल दिया|

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