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स्पेंसर का उद्विकासीय सिद्धांत
(Herbert Spencer’s Theory of evolution)

spencer ka udvikas ka siddhant

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spencer ka udvikas ka siddhant\niyam; स्पेन्सर ने जीव वैज्ञानिक डार्विन के विचारों के आधार पर समाज के उद्विकासीय स्वरूप को दर्शाने का प्रयास किया|डार्विन ने प्राकृतिक चयन (Natural Selection) का जो नियम जानवरों एवं पौधों के बारे में दिया था, उसे  स्पेन्सर ने जीव विज्ञान से हटकर मानवीय समाज पर लागू किया|

स्पेन्सर का सामाजिक उद्विकास क्या है?

हरबर्ट स्पेंसर के अनुसार संसार की प्रत्येक वस्तु; चाहे वह जैव हो या अजैव; का उद्विकास होता है| उद्विकास की यह  प्रक्रिया एक रेखीय क्रम में होती है; जो प्रकृति एवं समाज में हो रहे परिवर्तन के नियम को व्यक्त करता है|

डार्विन का सिद्धान्त

डार्विन ने अपने पुस्तक ओरिजिन ऑफ़ स्पीशीज (Origin of Species) में यह जानने का प्रयास किया कि; क्यों प्रजातीयां एक समयान्तराल में बदल जाती हैं| उनके अनुसार प्रकृति एवं प्राणी अपने भौतिक दशाओं से अनुकूलन करने के लिए सदैव संघर्ष करते रहते हैं| इस संघर्ष में जो विजयी होता है; वह जीवित रहता है; जबकि शेष नष्ट हो जाते हैं| इसे ही डार्विन प्राकृतिक चयन का नियम कहते हैं|

स्पेन्सर ने अस्तित्व के लिए संघर्ष के स्थान पर योग्यतम की उत्तरजीविता (Survival of fittest) का अपयोग किया| प्राकृतिक चयन की प्रक्रिया (Process of Natural selection) का भी प्रयोग उन्होंने उद्विकास को समझाने में  किया|

स्पेन्सर के अनुसार जो व्यक्ति शारीरिक रूप से असक्षम है; एवं समाज की संस्थाओं के साथ अनुकूलन नहीं कर पाते; वे नष्ट हो जाते हैं| सामाजिक उद्विकास की प्रक्रिया भी उन्हीं नियमो द्वारा संचालित होती है; जो नियम भौतिक तथा प्राणीशास्त्रीय उद्विकास का आधार है|

स्पेन्सर के अनुसार ब्रह्माण्ड निश्चित नियमों से संचालित होता है; एवं ये नियम उद्विकास का नियम है; जिसके द्वारा प्रकृति एवं समाज दोनों का अनुरक्षण एवं परिवर्तन होता है; जैसे- असावयवी से सावयवी (in-organic to organic), सावयवी से अधि-सावयवी है|

परिवर्तन की दिशा को निम्न बिंदुओं में देखा जा सकता है –

(1) सरल से जटिल  (Simple to Complex)

(2) समरूपता से विषमरूपता (Homogeneity to Heterogeneity)

(3) असम्बद्धता से सम्बद्धता (Un-coordination to Coordination)

(4) अनिश्चितता से निश्चिता (Uncertainity to Certainity)

स्पेन्सर ने उद्विकासीय समाज के चार अवस्थाओं का उल्लेख किया है; जिसे निम्न बिन्दुओं में देखा जा सकता है –

(1) सरल समाज (Simple Society)

यह मानव समाज का सबसे आरंभिक स्वरुप था| जिसमें व्यक्तियों एवं समूहों के बीच कोई सम्बद्धता नहीं थी| व्यक्तियों के बीच उच्चता एवं निम्नता का कोई भेद नहीं था| सामाजिक संरचना बहुत सरल थी| यह कुछ परिवारों से मिलकर बना था| इस समाज में सब एक दूसरे से घुले-मिले थे, अतः कोई स्पष्टता नहीं थी|

(2) मिश्रित समाज (Compound Society)

यह समाज सरल समाज की अपेक्षा संगठित होता है| व्यक्ति एक दूसरे से अधिक सम्बद्ध होने लगते हैं| समाज की प्रत्येक संस्था अलग होकर धीरे-धीरे स्पष्ट होने लगती है| इस समाज में श्रम विभाजन का अविर्भाव हुआ एवं पारस्परिक निर्भरता का जन्म हुआ|

(3) दोहरा मिश्रित समाज (Doubly Compound Society)

इस समाज में विभिन्न गोत्र के समुदाय एक जनजाति के रूप में स्थापित हो गए तथा समाज की विभिन्न संस्थाएं लगभग स्वायत्त हो गई| इस समाज में नियंत्रणकारी व्यवस्था जैसे – राज्य, नागरिक प्रशासन, सैन्य नौकरशाही एवं स्थानीय शासन कार्य करने लगा| व्यापार के लिए समाज का अपना बाजार स्थापित हो गया| शहर एवं गाँव को जोड़ने के लिए सड़कों का निर्माण हो गया|

 (4) तिहरा मिश्रित समाज (Trebly Compound Society)

इस समाज में अनेक जनजातियाँ आपस में समन्वित होकर एक राष्ट्र-राज्य का निर्माण करती है| इस समाज में नियामक संस्थाएं पहले के समाज से अधिक जटिल हो गई हैं| इसके अंतर्गत राजनीतिक नेता, दल, राजनीतिक परिषद, स्थानीय स्तर पर राजनीतिक प्रतिनिधि, सैन्य संगठन आदि स्थापित हो गए| व्यापार करने के लिए लोगों के पास अनेक साधन उपलब्ध हो गए, जैसे – टेलीविजन, रेडियो आदि| यातायात के साधन के रूप में बस, ट्रेन आदि उपलब्ध हो गए| यह समाज लगभग वर्तमान समय को इंगित करता है|

आलोचना

(1) स्पेन्सर के सामाजिक उद्विकास का नियम सभी समाजों पर लागू नहीं हो सकता| क्योंकि सभी समाज के उद्विकास की परिस्थितियाँ एवं प्रतिमान भिन्न होते हैं|

(2) स्पेन्सर ने जीव की तुलना समाज से की है| जीव मूर्त है, जबकि समाज अमूर्त| दोनों में समानता कैसे संभव है|

वस्तुतः स्पेन्सर का सिद्धांत दोषमुक्त नहीं है| लेकिन वर्तमान समाज एवं इसके परिवर्तन को पूर्ण रूपेण समझने के लिए उद्विकासीय क्रम अत्यंत महत्वपूर्ण है|

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