आरक्षण (Reservation)


आरक्षण (Reservation) से समानता या एक पंगु राष्ट्र की तरफ बढ़ता भारत

आरक्षण के इतिहास पर गौर करें तो ब्रिटिश शासन द्वारा 1909 में मुस्लिमों को, 1919 में सिक्खों को एवं 1935 में दलितों को विधानसभाओं एवं स्थानीय निकायों की सीटों में आरक्षण का प्रावधान किया गया, जो राजनीतिक महात्वाकांक्षा से प्रेरित था एवं जिसका तात्कालिक उद्देश्य भारत की एकीकृत जनता में फूट डालना था|

स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद संविधान निर्माताओं ने पाया कि भारतीय समाज में असमानता (सामाजिक, आर्थिक एवं राजनीतिक) व्यापक स्तर पर है| जहां असमानता होती है वहां शोषण होता है, चाहे वह प्रत्यक्ष हो या अप्रत्यक्ष| इसके चलते पिछड़ा समूह काल-क्रम में और पिछड़ता चला जाता है| समाज का एक हिस्सा पिछड़ा एवं वंचित होने से देश का विकास भी बाधित होता है| इसलिए देश ने अपने उत्तरदायित्व को निभाते हुए पिछड़े समुदाय की छतिपूर्ति के लिए 10 वर्षों के लिए आरक्षण का प्रावधान किया ताकि पिछड़ा समुदाय इस काल-क्रम में आरक्षण का लाभ उठाकर अपने साथ-साथ देश के विकास का हिस्सा बन सके|

आरक्षण का प्रावधान सिर्फ 10 वर्षों के लिए किया गया था| लेकिन 10-10 वर्ष तक बढ़ाते हुए इसे अनंत समय तक चलने वाली व्यवस्था के रूप में देखा जाने लगा है| साथ ही आज तक किसी ऐसी समिति या आयोग का गठन नहीं किया गया है जो इस बात का पता लगा सके की आजादी के 70 वर्षों तक आरक्षण दिए जाने के बावजूद भी क्या लोगों में समानता आयी है? तथा जो समुदाय एक निश्चित स्तर तक समानता को प्राप्त कर लिया है, उस पर से आरक्षण हटाया जा सके|

आरक्षण की खामियाँ (Drawbacks of Reservation)

(1) आरक्षण का प्रावधान निम्न से लेकर उच्च तक सभी पदों के लिए क्यों किया गया – अगर आरक्षण द्वारा हम निचले तपके के लोगों को ऊपर उठाना चाहते हैं, तो इसका कतई मतलब यह नहीं कि उन्हें सर्वोच्च पद पर बैठा दिया जाय| इस कमी को एक उदाहरण से समझते हैं – अगर कोई व्यक्ति किसी डॉक्टर से इलाज करवाता है या कोई बच्चा स्कूल या कॉलेज में पढ़ने जाता है, तो इस बात की कम से कम 50% संभावना तो है, कि वह डॉक्टर या टीचर अयोग्य हो| चलिए डॉक्टर को तो हम कोशिश करके बदल भी सकते हैं, लेकिन यदि किसी स्कूल या कॉलेज में कोई बच्चा एडमिशन लेता है और दो टीचर बेहतर पढ़ा रहे हैं एवं किसी एक या दो विषय के टीचर का प्रदर्शन ठीक नहीं है| कारण हम सब जानते हैं| ऐसे मैं वह विद्यार्थी क्या करे| क्या उसकी इस समस्या का समाधान भारत का कोई भी स्कूल या कॉलेज कर सकता है? जवाब है नहीं| उस टीचर से कोई एक कैटेगरी का बच्चा नहीं पढ़ता, बल्कि पूरा समाज पढ़ता है| जिस शिक्षा के बल पर बच्चा या युवा अपनी समस्त समस्याओं का समाधान ढूँढ़ने का प्रयास करता है| शास्त्रों में जिसे गरीबों का धन या सामर्थ्य कहा गया है, उस शिक्षा को शुरु से अंत तक कहीं न कहीं विकलांग बनाया जा रहा है, और आप लोगों ने भी पढ़ने के दौरान किसी न किसी क्लास में अवश्य महसूस किया होगा कि किसी विषय के अध्यापन में खामियां है| मैं यह नहीं कहता कि बिना आरक्षण के सभी टीचर बेहतर प्रदर्शन करते हैं लेकिन यदि एक निश्चित मानदण्ड के अनुसार व्यक्ति का चयन होता है तो अच्छे प्रदर्शन की संभावना बहुत अधिक बढ़ जाती है|

आरक्षित टीचर से किसी एक कैटेगरीे का बच्चा नहीं पढ़ता, बल्कि पूरे समाज के बच्चे पढ़ते हैं| इस तरह एक टीचर अपने जीवन काल में हजारों विद्यार्थियों को शैक्षणिक रूप से विकलांग बनाता है| ऐसे में आरक्षण से समाज में समानता आ रही है या विकलांगता? यह विचारणीय प्रश्न है| इस परिस्थिति में जिनके परिवार की आर्थिक स्थिति मजबूत है वह अपने बच्चे को अलग से प्राइवेट ट्यूशन लगवा लेते हैं, जिसकी फीस स्कूल एवं कॉलेज की फीस से कई गुना अधिक होती है| लेकिन जिनकी आर्थिक स्थिति मजबूत नहीं है, उनका बच्चा सदा के लिए पिछड़ जाता है| आगे चलकर यही ट्यूशन वाले बच्चे ही आरक्षण का लाभ लेते हैं| इससे दो बातें स्पष्ट होती है –

पहला – आरक्षण केवल प्रतिभाओं को ही दरकिनार नही कर रहा है बल्कि नन्हे प्रतिभाओं को भी कली अवस्था में ही कुचल दे रहा है|
दूसरा – आरक्षण को भले ही जातीय आधार पर दिया जा रहा है, लेकिन वास्तव में यह आर्थिक रूप से संपन्न लोगों को ही दिया जा रहा है| जिन्होंने एक बार आरक्षण का लाभ ले लिया है, उनका परिवार ही पीढ़ी दर पीढ़ी इसका लाभ उठा रहा है|

(2) भारतीय संविधान में सामाजिक एवं शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्गों के लिए नौकरियों में आरक्षण का प्रावधान है| लेकिन हमने वर्ग की पहचान जाति के रूप में की| जो इसकी सबसे बड़ी कमी है, क्योंकि असमानता समाज के कई आयामों में थी| मुख्यत: आर्थिक असमानता व्यापक स्तर पर थी| जबकि आरक्षण देने का प्राथमिक लक्ष्य पिछड़े समुदायों की आर्थिक स्थिति मजबूत करना था, एेसे में आर्थिक पक्ष जैसे महत्त्वपूर्ण आयाम को नजरन्दाज करना आरक्षण की सबसे बड़ी कमी है|

(3) अगर हम यह मान भी लें कि वर्तमान आरक्षण पद्धति सही है, तो ऐसी व्यवस्था चुनाव में क्यों नहीं लागू होती| जिस दिन 4 लाख वोट पाने वाला प्रत्याशी हार जाएगा एवं 40 हजार पाने वाला विधायक या सांसद बन जाएगा| तब समझ में आएगा कि युवाओं का दर्द क्या है? और तब आरक्षण पर पुनर्विचार करने के लिए युवा नहीं, नेता धरना देते नजर आएंगे| यह तो युवाओं का धैर्य एवं संतोष है, वरना इतनी बड़ी नाइंसाफी इतिहास ने कभी बर्दाश्त नहीं किया है| भारत का ही उदाहरण ले तो अहिंसा की नीव रखने वाले गांधीजी का भी जब धैर्य टूटा, तब 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन के समय उन्होने करो या मरो (Do or Die) का नारा दिया था| इसलिए प्रत्येक चीज की एक सीमा है, और बदलना प्रकृति का नियम है| इसलिए युवाओं के धैर्य एवं सब्र का सम्मान करने की जरूरत है तथा आरक्षण की प्रक्रिया एवं आधार पर पुनर्विचार करने की आवश्यकता है| वरना आरक्षण छोड़ो आंदोलन (Leave Reservation Movement) के बीज को एक विशालकाय वृक्ष बनने से रोक पाना संभव नही होगा|

मेरा यहाँ आरक्षण छोड़ो आंदोलन का तात्पर्य केवल किसी विशेष कैटेगरी के जाति तक सीमित नहीं है, बल्कि देश की उन सभी जातियों एवं धर्मों को समाहित करता है, जो शिक्षा, स्वास्थ्य एवं अन्य स्तर पर आरक्षण जैसी बीमारी का शिकार हैं| किसी सरकारी अस्पताल में अयोग्य डॉक्टर की लापरवाही से जब बच्चों की जान चली जाती है, तब यह हादसा जाति पूछकर नहीं आता है बल्कि इसका शिकार पूरा समाज होता है| जो किसी आतंकवाद से कम भयावह नहीं होता| सरकारी अस्पतालों में एक्सपायरी डेट की भी दवा देते हुए देखा गया है, यह केवल भ्रष्टाचार का ही नहीं बल्कि पद एवं योग्यता की संवेदनशीलता से भी जुड़ा हुआ मामला है| जब किसी पद पर नियुक्ति, निश्चित मानदंड को पूरा करने वाले शिक्षित एवं योग्य व्यक्ति की होती है, तो वह अपनी जिम्मेदारी महसूस करता है, एवं अपने कार्य को लगन एवं निष्ठा से करता है| यह उसी तरह है, जैसे – जब तक एक बेटा अपने बाप के पैसे खर्च करता है तब तक उसे पैसे के वास्तविक मूल्य का एहसास नहीं होता| लेकिन जब स्वयं कमाता है तब उसे ज्ञात होता है कि पैसा कितनी मेहनत से आता है|

(4) आरक्षण देना ही था तो आरक्षित लोगों के लिए अलग से वैकेंसी क्यों नहीं निकाली जाती, जैसा राजनीति क्षेत्र में होता है| जिस निर्वाचन क्षेत्र (Constituency) की सीट रिजर्व हैं, वहां से कोई अनारक्षित कैटेगरी का चुनाव नहीं लड़ सकता| प्री. (Prelims), मेंस (Mains), इंटरव्यू (Interview) लेने के बाद देश का युवा, जो देश का भविष्य भी है, योग्य होने के बावजूद उसे इस आधार पर निकाल दिया जाता है कि वह एक विशेष जाति का नहीं| क्या यह उसकी मेहनत और भावनाओं के साथ खिलवाड़ नहीं| ऐसी स्थिति में संविधान के अनुच्छेद 14 विधि के समक्ष समता (Equality before Law) एवं अनुछेद 15 धर्म, मूलवंश, जाति, लिंग या जन्म-स्थान के आधार पर विभेद नहीं किया जाएगा, का सम्मान कैसे होगा| संविधान का अनुच्छेद 15 (4) कहता है कि पिछड़े वर्गों के लिए राज्य विशेष प्रावधान कर सकता है, सामान्य बड़ा होता है एवं विशेष छोटा| लेकिन 60% आरक्षण देकर विशेष प्रावधान को सामान्य प्रावधान बना दिया गया है| इस तरह अनुच्छेद 15 की मूल भावना को ही पलट दिया गया है|

अनुच्छेद 335 में जिस आरक्षण का प्रावधान नौकरियों में किया गया है उसमें यह भी स्पष्ट किया गया है कि प्रशासन की दक्षता को बनाने रखते हुए ही यह व्यवस्था प्रदान किया जाय| जबकि शून्य (Zero) एवं माइनस (Negative) में नम्बर पाने वाला भी सरकारी पद पर आसीन है और उससे कहीं अधिक योग्य को बाहर कर दिया गया है| अब इसे भारत का दुर्भाग्य कहें या देश के साथ घिनौना मजाक| क्या यह अंबेडकर के संविधान के साथ खिलवाड़ नहीं| कारण स्पष्ट है, हमारे देश का राजनीतिक वर्ग जनता को इंसान नहीं वोट के रूप में देखता हैं| मैं यह पूँछना चाहता हूं कि संविधान की प्रस्तावना (Preamble) में, प्रतिष्ठा और अवसर की समता प्राप्त कराने के लिए दृढ़ संकल्प होकर, जिस संविधान को अंगीकृत, अधिनियमित और आत्मार्पित किया गया था, उन शब्दों का सम्मान कैसे हो|

प्रधान से लेकर सांसद तक के चुनाव में अगर कोई नेता 50 -100 वोटों से हारने लगता है, तो वह अपने समस्त ताकत का इस्तेमाल कर विपक्षी से विजयी होने का प्रयास करता है| और आप लोगों ने देखा भी होगा चुनाव के नतीजे बदल दिए गये हैं| तो हम आज यहां यही पूछना चाहते हैं कि हारने के बावजूद भी कोई नेता उसे जीत में बदलना चाहता है तो एक युवा अपने गरीब माँ-बाप के पैसों से अथक मेहनत कर 200 नंबर पाकर 40 नंबर पाने वाले से जब पिछड़ जाता है, और उसे नौकरी नहीं मिलती है, तो वह इस हादसे को कैसे बर्दाश्त करें| इस वेदना और खून के आंसू को वह अपने शरीर में कैसे अवशोषित करता है, इसे बयां करने के लिए दुनिया की किसी डिक्शनरी में शब्द नहीं है| इससे उस युवा, उसके मां- बाप एवं परिवार के अरमानो का दफन तो होता ही है साथ ही बचपन से लेकर अब तक पढ़ी गई सारी मैथ (Maths) भी यह सोंचकर फेल हो जाती है कि 200 नंबर से 40 नंबर बड़ा कैसे?

(5) आरक्षण द्वारा हम पिछड़ी जातियो की स्थिति को उच्च जातीय स्थिति के स्तर पर लाना चाहते हैं| लेकिन इस आरक्षण का लाभ पिछड़ी जातियों के ही शैक्षणिक एवं आर्थिक रूप से संपन्न कुछ लोगों द्वारा पीढ़ी-दर-पीढ़ी प्राप्त किया जा रहा है, इससे असमानता का गैप उच्च एवं पिछड़ी जातियों की अपेक्षा, पिछड़ी जातियों के आपस में कहीं अधिक हो गया है| क्रीमी लेयर एवं हरिजन एलिट जैसी अवधारणा समस्या के रूप में सामने आयी है|

(6) जाति आधार पर आरक्षण की मुख्यत: तीन कटेगरी है – SC, ST और OBC, प्रत्येक कैटेगरी में बहुत सी जातियाँ हैं, जिनकी सामाजिक, शैक्षणिक एवं आर्थिक स्थिति में असमानता है| ऐसे में अनेक जातियों को एक ही कैटेगरी में लाने से सभी जातियों के साथ न्याय कैसे होगा|

(7) वर्तमान में 60% पदों पर आरक्षण का प्रावधान है| जिस देश के 60% सार्वजनिक पदों पर अयोग्य लोगों को बैठा दिया जाता हो, उस देश का भविष्य कहाँ तक सुरक्षित एवं उज्ज्वल हो सकता है, यह कामन सेंस (Common Sense) की बात है|

(8) भारत में आरक्षण के लिए OBC में क्रीमी लेयर की सीमा ₹8 लाख प्रतिवर्ष है| जबकि गरीबी, रंगराजन समिति की रिपोर्ट के अनुसार 32 रुपये प्रतिदिन ग्रामीण क्षेत्र एवं 47 रूपए प्रतिदिन शहरी क्षेत्र में पानी वाला व्यक्ति गरीब नहीं है| वर्ष में इसका आकलन करें तो लगभग 17155 रुपये प्रतिवर्ष शहरों में एवम 11680 रुपये ग्रामीण क्षेत्रों में पाने वाला व्यक्ति गरीब नहीं है| इसके बावजूद 29.5% लोग गरीबी रेखा के नीचे है| ऐसे में क्रीमी लेयर की सीमा 8 लाख रुपए निर्धारित करना कहाँ तक तार्किक है| स्पष्ट है कि क्रीमी लेयर के आसपास के लोग ही आरक्षण का लाभ ले रहे हैं|

(9) जाति के आधार पर आरक्षण देने से जातीय चेतना बढ़ी है एवं जातिवाद को बढ़ावा मिला है| आरक्षण समय-समय पर राजनीति का भी शिकार रही है| राजनीतिज्ञों द्वारा अपने वोट बैंक के लिए विभिन्न जातियों को आरक्षण प्राप्त जातियों की श्रेणी में लाया जाता रहा है| जिसका डोमिनो प्रभाव (एक घटना के प्रभाव से दूसरी घटना का होना) भी देखने को मिला है|

(10) वर्तमान आरक्षण पद्धति एक ही कैटेगरी के लोगों के साथ न्याय नहीं कर पाता| इसके लिए अगर हम OBC कैटेगरी का एक उदाहरण ले तो OBC कैटेगरी का व्यक्ति थोड़ा अधिक नंबर पाकर यदि जनरल कैटेगरी में क्वालीफाई कर जाता है तो उससे कम नम्बर पाने वाला OBC कैटेगरी के व्यक्ति को उच्च पद मिलता है,जबकि अधिक नंबर पाकर जनरल में क्वालीफाई करने वाले OBC कैटेगरी के ही व्यक्ति को निम्न पद मिलता है| जिस आरक्षण पद्धति में एक ही कैटेगरी के व्यक्ति के ज्यादा नंबर पाने वाले को हतोत्साहित होना पड़ता है एवं कम नंबर पाने वाले को प्रोत्साहन मिलता है, ऐसे आरक्षण पद्धति पर प्रश्न चिह्न लगना स्वाभाविक है| साथ ही कभी-कभी OBC वर्ग के युवाओं को शिकायत रहती है कि जनरल की मेरिट कम गई है एवं OBC की ज्यादा गई है, अगर हम जनरल होते तो क्वालीफाई कर गए होते| स्पष्ट है कि वर्तमान आरक्षण पद्धति से संपूर्ण समाज को कम या अधिक शिकायत है| शायद इसीलिए बाबासाहेब अम्बेडकर ने कहा था कि 10 वर्ष से अधिक आरक्षण देश के हित में नहीं होगा|

आरक्षण का प्रावधान इस सोंच के आधार पर भी किया गया था कि यदि एक व्यक्ति इसका लाभ प्राप्त कर लेता है तो वह अपने आस-पास एवं अपनी जाति के लोगों को शिक्षा एवं विकास में पथ-प्रदर्शक बनेगा| लेकिन हो रहा इसके विपरीत है| जिन्हें आरक्षण का लाभ मिला है, वे ही पीढ़ी दर पीढ़ी इसका लाभ ले रहे हैं एवं अपनी ही जाति के लोगों से या तो दूरी बना लिये हैं या अपना गांव छोड़कर शहर में रहने लगे हैं| मेरा यहाँ कहने का तात्पर्य बिल्कुल नहीं है कि जिसे शहर में नौकरी मिले वह गाँव छोड़कर न जाय| लेकिन आर्थिक स्थिति सुधर जाने पर लोग क्यों अपनी ही जाति के लोगों से दूरी बनाते हुए दिखाई पड़ते हैं| इसे समाजशास्त्री एम. एन. श्रीनिवास की संस्कृतिकरण (Sanskritization) की अवधारणा के रूप में देखा जा सकता है| इससे यह निष्कर्ष निकलता है कि वर्तमान समय में जाति नहीं बल्कि वर्ग प्राथमिक महत्त्व रखता है| इसलिए आरक्षण के आधार के रूप में आर्थिक स्थिति को नजरन्दाज करना यथार्थ के साथ खिलवाड़ है|

आरक्षण (Reservation) पहले जाति आधार पर था, अब क्यों नहीं होना चाहिए

भारत जब आजाद हुआ था तब देश की लगभग 80% से अधिक जनसंख्या ग्रामीण क्षेत्रों में रहती थी| जिसमें जातियाँ उच्चता एवं निम्नता के आधार पर बँटी थी| प्रत्येक जाति एक निश्चित पेशे (Profession) से जुडी थी, जैसे – ब्राह्मण का कार्य पूजा करवाना, कहार का कार्य पानी भरना, नाई का कार्य बाल काटना आदि| यह पेशा पीढ़ी दर पीढ़ी स्थानान्तरित होता था| इसी पेशे के आधार पर जाति की पहचान होती थी| जातियाँ अपना पेशा नहीं बदल सकती थी| ऐसे में जो जातियाँ पिछड़ी थी, उसका कारण उनका जातिगत पेशा था|

लेकिन आजादी के 70 वर्ष बाद अब परिस्थितियाँ बहुत बदल चुकी है| वर्तमान में औद्योगीकरण एवं नई टेक्नोलॉजी के आने से जाति पर आधारित पेशा, योग्यता पर आधारित पेशा में बदल गया है, जैसे – ट्रैक्टर चलाना, कंप्यूटर चलाना, फैक्ट्रियों में मशीनें चलाना आदि कार्य किसी जाति से संबंधित न होकर योग्यता से संबंधित है|

दूसरी तरफ जजमानी व्यवस्था भी मुद्रा के कारण टूट गई है| अब जातिगत आधार पर पेशा भी अब मुद्रा पर आधारित हो गया है, अर्थात् जातिगत आधारित पेशा का यदि कोई कार्य कर रहा है तो उसका उसे तुरंत नगद भुगतान मिल जाता है, जैसे – कुम्भकार द्वारा मिट्टी के बर्तन देना, नाई द्वारा बाल काटना| साथ ही नई पीढ़ी में देखा जाए तो 80 प्रतिशत से अधिक युवा अपना परम्परागत व्यवसाय छोड़ चुके हैं, एवं अपनी योग्यता के अनुसार अन्य कार्यों में संलग्न है| इसके अतिरिक्त जातिगत व्यवसाय में भी लचीलापन आया है, जैसे यदि गाँव से लेकर शहर तक जूता-चप्पल की दुकान पर गौर करें तो इसका मालिक कोई निम्न जाति का ही नहीं बल्कि उच्च जाति के लोग भी शामिल हैं| यहाँ तक कि शहरों में जो पूजा-पाठ करवाते हैं, उन्हें भी दावे के साथ नहीं कहा जा सकता कि वे ब्राह्मण ही हैं| जब पेशा का इतने बड़े स्तर पर विविधीकरण हो गया है, तो आरक्षण जैसे गंभीर मुद्दे के लिए इतनी संकीर्ण मानसिकता क्यों? जो जाति पर आकर टिक जाती है| एक सफाई कर्मी के वैकेंसी निकलने पर सभी जाति के दसवीं पास से लेकर Ph.D धारक तक लाखों फॉर्म पड़ जाते| इससे यही स्पष्ट होता है कि अब जाति नहीं बल्कि आर्थिक स्थिति प्राथमिक महत्त्व रखती है|

यहाँ कुछ नए उभरते हुए नेता यह तर्क कर सकते हैं, चूँकि पहले जाति आधार पर आरक्षण था, इसलिए आज ही वही आधार होना चाहिए| मेरा उनको जवाब है, उन लोगों की स्थिति उस बच्चे की समान है, जो पहली कक्षा में a,b,c,d या क,ख, ग,घ पढ़ा हो तथा जब वह पाँचवी या आठवी कक्षा में पहुँच जाए तब भी यही कहे कि हम तो पहले a,b,c,d एवं क, ख, ग, घ, पढे़ थे इसलिए आज भी हमे यही पढ़ाया जाय| इसलिए हम कहना चाहते हैं कि 1947 में भारत की स्थिति अलग थी, आज उससे बिल्कुल भिन्न है| पहले जाति प्राथमिक था, आज वर्ग है, इसे सरकार को भी बार-बार सोचना चाहिए|

यहां कुछ लोग हमसे यह प्रश्न कर सकते हैं कि अगर वर्तमान आरक्षण पद्धति सही नहीं है तो आरक्षण किस तरह होना चाहिए| आइए समतावादी समाज की स्थापना के लिए हम आरक्षण का एक प्रारूप की विवेचना करते हैं –

(1) प्रथम, द्वितीय, तृतीय श्रेणी के पदों में कोई आरक्षण नहीं होना चाहिए| इसके लिए तर्क यह है कि आरक्षण सामाजिक, शैक्षणिक एवं आर्थिक रूप से पिछड़े लोगों को विशेष सावधान करता है| जिनके पास साधन एवं संसाधन उपलब्ध है, वे उच्च पदों पर अपनी योग्यता के अनुसार पहुँच सकते हैं| आरक्षण के बैसाखी की उन्हें जरूरत नहीं है|

(2) सभी पेशागत श्रेणी जैसे – वकील, डॉक्टर, इंजीनियर, टीचर आदि से आरक्षण पूरी तरह समाप्त कर देना चाहिए|

(3) सभी के लिए शिक्षा एवं स्वास्थ्य मुफ्त कर देना चाहिए

(4) आरक्षण का लाभ यदि प्रथम पीढ़ी को मिल गया है तो दूसरी पीढ़ी को इसका लाभ नहीं मिलना चाहिए|

(5) आरक्षण सिर्फ आर्थिक आधार पर दिया जाना चाहिए| भारत में लगभग 30% लोग ऐसे हैं जो गरीबी रेखा के नीचे हैं| आरक्षण ऐसे लोगों को ही मिलना चाहिए| वास्तविक रूप से आरक्षण की आवश्यकता इन्हे ही है|

(6) आरक्षण 5-10 % से अधिक नहीं होना चाहिए| तथा एक ऐसे संस्था का निर्माण करना चाहिए जो आरक्षण प्राप्त लोगों की स्थिति का मूल्यांकन कर सके एवं एक निश्चित समय के बाद आरक्षण को समाप्त किया जा सके|

(7) जनसंख्या का कानून बनाया जाय| एक निश्चित सीमा से अधिक जिनके पास बच्चे हैं, उनके परिवार को आरक्षण का लाभ नहीं मिलना चाहिए| यहाँ कुछ लोग तर्क कर सकते हैं कि जिनके पास अधिक बच्चे हैं उन्हें तो और आरक्षण की आवश्यकता है| मेरा जवाब है कि अधिक बच्चे सरकार के भरोसे पैदा न करें और हमेशा यह न पूछें कि इस देश ने आपके लिए क्या किया| इसका भी जवाब दें कि आप इस देश के लिए क्या कर सकते हैं|

यहाँ कुछ लोग यह तर्क कर सकते हैं कि शिक्षा एवं स्वास्थ्य मुफ्त करने के बावजूद भी हो सकता है कुछ लोग समाज की मुख्यधारा में शामिल नहीं हो पाएं|तो मेरा जवाब है, जिस देश में शिक्षा एवं स्वास्थ्य मुफ्त हो| शौचालय एवं आवास की सुविधाएं सरकार मुहैया कराती हो, परिवार के लिए 2 रुपये किलो गेहूं, 3 रुपए किलो चावल तथा बच्चों के लिए मिड डे मील की व्यवस्था का जिम्मा सरकार के ऊपर हो, परिवार के एक सदस्य को सौ दिन के रोजगार की गारंटी हो| ऐसे में यदि कोई सरकारी नौकरी नहीं पाता, तो यह उसकी कमी है| साथ ही यह आवश्यक भी नहीं कि जितने लोग फॉर्म भरते हैं| सबको नौकरी मिल ही जाती है| जिस गति से जनसंख्या बढ़ रही है, उतना संसाधन या नौकरी भारत सरकार के पास उपलब्ध ही नहीं है| साथ ही प्राइवेट सेक्टर एवं स्वयं का व्यवसाय भी तो उपलब्ध है|

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