संयुक्त परिवार (Joint Family)


सयुक्त परिवार में सामान्यतः उन सभी व्यक्तियों को सम्मिलित किया जाता है जो एक समान पूर्वजों की संतानें हों, इसमें कुछ विवाह संबंधी भी होते हैं| भारत में परिवार का तात्पर्य संयुक्त परिवार से ही है| आइ. पी. देसाई (I. P. Desai) ने नाभिकीय परिवार को विकलांग परिवार (Fractured Family) कहा है|

के.एम.पनिक्कर (K. M. Panikkar) अपनी पुस्तक हिंदू सोसाइटी ऐट क्रॉसरोड (Hindu Society at Crossroads) में लिखते हैं कि हिंदू समाज की इकाई व्यक्ति नहीं बल्कि संयुक्त परिवार है|

एस. सी. दूबे (S. C. Dube) अपनी पुस्तक “मानव और संस्कृति” में लिखते हैं कि यदि कई मूल परिवार एक साथ रहते हो और उनमें निकट का नाता हो, एक ही स्थान पर भोजन करते हों और एक आर्थिक इकाई के रूप में कार्य करते हो तो इनके सम्मिलित रूप को संयुक्त परिवार कहा जा सकता है|

जर्मन विद्वान एवं भारतविद्या उपागम के समर्थक जूलियस जॉली (Julius Jolly) अपनी पुस्तक हिंदू लॉ एण्ड कस्टम (Hindu Law and Custom) में लिखते हैं कि न केवल माता-पिता तथा संतान, भाई तथा सौतेले भाई सामान्य सम्पत्ति पर रहते हैं बल्कि कभी-कभी इनमें कई पीढ़ियों तक की संतानें पूर्वज तथा समानांतर (Parallel) संबंधी भी सम्मिलित रहते हैं|

ईरावती कर्वे (Iravati Karve) अपनी पुस्तक किनशिप ऑर्गनाइजेशन इन इंडिया (Kinship Organisation in India) में लिखती हैं कि एक संयुक्त परिवार ऐसे व्यक्तियों का समूह है जो सामान्यतः एक ही घर में रहते हैं| एक ही रसोई में बना भोजन करते हैं| संपत्ति के सम्मिलित स्वामी होते हैं एवं सामान्य पूजा में भाग लेते हैं तथा जो किसी न किसी रूप में एक दूसरे के रक्त संबंधी होते हैं|

संयुक्त परिवार की विशेषताएँ (Characteristics of Joint Family)

(1) सामान्य या साझा निवास (Common residence)

(2) सामान्य रसोईघर (Common Kitchen)

(3) साझी संपत्ति (Common Property)

(4) सामान्य पूजा तथा धार्मिक कर्तव्य|

(5) एक दूसरे के रक्त संबंधी|

(6) बड़ा आकार|

(7) परिवार का एक कर्ता या मुखिया|

(8) परस्पर अधिकार एवं दायित्व से जुड़े रहने का बोध|

संयुक्त परिवार के लाभ या प्रकार्य या गुण

(1) सामाजिक प्रकार्य

(i) सामाजिक बीमा – संकट के समय जैसे बुढ़ापे में संयुक्त परिवार सहारा होता है|

(ii) संस्कृति का संरक्षण|

(iii) समाजीकरण का कार्य|

(2) आर्थिक प्रकार्य –

(i) संपत्ति विभाजन से रक्षा|

(ii) अधिक जनसंख्या होने के कारण कृषक अर्थव्यवस्था के अनुकूल|

एम. एस. गोरे (M. S. Gore) अपनी पुस्तक अर्बनाइजेसन एंड फैमिली चेंज (Urbanization and Family Change) में लिखते हैं कि नगरीकरण संयुक्त परिवार की संयुक्तता को बढ़ाता है घटाता नहीं है| उन्होंने दिल्ली के अग्रवाल परिवार का अध्ययन कर यह निष्कर्ष दिया था|

दोष –

(1) स्व: निर्भरता की कमी – एक साथ रहने से व्यक्ति स्वनिर्भर नहीं बन पाता है, विपरीत परिस्थितियों में उसके समक्ष बड़ी समस्या उत्पन्न हो जाती है|

(2) स्त्रियों की निम्न प्रस्थिति – संयुक्त परिवार में स्त्रियों के घर से बाहर निकलने तथा सार्वजनिक स्थलों पर जाने की सामान्यतः मनाही रहती है| अतः स्त्री पुरुष असमानता सबसे अधिक संयुक्त परिवार में ही पाया जाता है|

(3) गतिशीलता में कमी – सब कुछ सामूहिक होने के कारण व्यक्तिगत जिम्मेदारी नहीं रहती है, जिससे गतिशीलता के कम अवसर मिलते हैं|

(4) मानसिक कुंठा – संयुक्त परिवार में व्यक्तिगत स्वतंत्रता बाधित रहती है| अतः व्यक्ति कुंठित महसूस करता है|

(5) सामाजिक समस्यायें – पर्दा-प्रथा, दहेज-प्रथा, बाल-विवाह आदि को संयुक्त परिवार में प्रश्रय मिलता है|

(6) परिवर्तन के प्रति उदासीन – संयुक्त परिवार का मुखिया एक या दो पीढ़ी पहले का होता है| अतः पुरानी परम्परा के साथ परिवार चलाता है| नवीनता को अपनाने के प्रति उमंग नहीं दिखायी देता है|

सयुक्त परिवार में परिवर्तन (Change in Joint Family)

(1) आकार – शिक्षा एवं रोजगार के लिए शहरों की तरफ पलायन करने से संयुक्त परिवार का आकार छोटा हुआ है|

(2) मुखिया के प्रभाव में कमी – अब पारिवारिक निर्णय में मुखिया के बजाय रोजगार युक्त सदस्य की सहमति अधिक प्रभावी होती है|

(3) स्त्रियों की प्रस्थिति में सुधार – बढ़ती शिक्षा एवं मुखिया के प्रभाव में कमी के कारण स्त्रियों की प्रस्थिति में काफी सुधार आया है|

(4) परम्पराओं में कमी – संयुक्त परिवार में अब परम्पराओं की जगह तार्किकता एवं आधुनिकता को महत्त्व दिया जाने लगा है|

(5) पारिवारिक संबंधों में परिवर्तन – पहले जहाँ सम्बन्ध पूरी तरह अनौपचारिक थे, किन्तु अब कुछ हद तक औपचारिक संबंधों का भी समावेश हो रहा है|

(6) सामूहिकता में कमी – पहले घर की पूजा से लेकर अन्य कार्य परिवार के सभी सदस्य एक साथ में करते थे किन्तु अब व्यस्तता, समय की कमी एवं अन्य स्थानों पर निवास होने से सभी सदस्य सामूहिक अवसरों पर साथ-साथ नहीं रह पाते हैं|

(7) आर्थिक कार्यों में परिवर्तन – पहले जहाँ संयुक्त परिवार उत्पादन एवं उपभोग दोनों की इकाई था| उद्योगीकरण एवं नगरीकरण के कारण अब परिवार सिर्फ उपभोग की इकाई रह गया है| उत्पादन का कार्य अलग फैक्ट्री में होने लगा|

संयुक्त परिवार में परिवर्तन के कारण

(1) उद्योगीकरण एवं नगरीकरण|

(2) आर्थिक महत्त्व का बढ़ना|

(3) शिक्षा एवं तकनीकी विकास|

(4) जनसंख्या वृद्धि|

(5) संयुक्त परिवार, सदस्यों की आवश्यकता को पूरा करने में असमर्थ|

(6) कानून एवं अधिकारों की जागरुकता|

(7) बढ़ती व्यक्तिवादिता|

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