कॉम्टे का प्रत्यक्षवाद (Positivism of Auguste Comte)

कॉम्टे का प्रत्यक्षवाद

प्रत्यक्षवाद (Positivism)

                                        प्रत्यक्षवाद एक विचारधारा या दर्शन है, जिसके प्रतिपादन का श्रेय अगस्त काम्टे (August Comte) को जाता है| यह दर्शन इस बात में विश्वास करता है कि प्राकृतिक विज्ञानों के अध्ययन पद्धति का प्रयोग समाज के अध्ययन में भी किया जा सकता है| काम्टे के अनुसार प्रत्यक्षवाद एक विशुद्ध वैज्ञानिक अवधारणा है जिसका प्रयोग समाज के अध्ययन में भी किया जा सकता है|

उनके अनुसार प्रत्यक्षवादी प्रणाली के अंतर्गत सर्वप्रथम हम अध्ययन विषय को चुनते हैं, फिर अवलोकन द्वारा उस विषय से सम्बन्धित आनुभविक सूचनाओं को एकत्रित करते हैं, एवं अंततः अध्ययन के निष्कर्ष को प्राप्त करते हैं| इस तरह प्रत्यक्षवाद के आधार पर प्राप्त निष्कर्ष निश्चित एवं विश्वसनीय होता है|

                               कॉम्टे के पहले के विचारक प्रत्यक्षवादी पद्धति अर्थात वैज्ञानिक पद्धति का समाज के अध्ययन में प्रयोग को असम्भव मानते थे, लेकिन कॉम्टे ने इसे सम्भव बना दिया| प्रत्यक्षवादी अध्ययन पद्धति में इंद्रिय अनुभव को सर्वाधिक महत्त्व दिया जाता है, क्योंकि इंद्रिय अनुभव से प्राप्त ज्ञान का सत्यापन सम्भव होता है एवं सत्यापित होने वाला ज्ञान कल्पना और तर्क पर आधारित ज्ञान की अपेक्षा अधिक निश्चित होता है|

                                                  प्रत्यक्षवादी ज्ञान के आधार पर अपने इच्छा अनुरूप समाज में परिवर्तन किया जा सकता है| इस संदर्भ में कॉम्टे का यह कथन महत्वपूर्ण हो जाता है कि; समझना पूर्व कथन करना है और पूर्व कथन करना ही नियंत्रण करना है| तात्पर्य है कि यदि हम किसी वर्तमान घटना एवं प्रक्रिया को प्रत्यक्षवादी या तथ्यात्मक आधार पर समझ लें; तो उसके बारे में भविष्य में घटने वाली घटना का पूर्वानुमान किया जा सकता है; ऐसा होने से उस पर नियंत्रण की सम्भावना बढ़ जाती है|

                                               कॉम्टे लिखते हैं कि प्रत्यक्षवाद अपने क्षेत्र से धार्मिक एवं दार्शनिक विचारों का बहिष्कार करता है, क्योंकि इसके द्वारा प्राप्त ज्ञान सत्य एवं असत्य दोनो हो सकता है| साथ ही इसका सत्यापन पूरी तरह सम्भव ही नहीं है|                          

                    

प्रत्यक्षवाद की मूल मान्यतायें (Basic Postulates of Positivism) –

(1) प्रत्यक्षवाद में अनुमान या कल्पना का कोई स्थान नहीं होता है|

(2) प्रत्यक्षवाद में यथार्थ को अवलोकन, परीक्षण तथा तुलना द्वारा निष्कर्षित किया जाता है|

(3) सामाजिक घटनाएँ अनायास न होकर प्राकृतिक घटनाओं की भाँति किसी न किसी नियम के अनुरूप ही कार्य करती हैं|

(4) प्रत्यक्षवाद निरपेक्ष रूप से घटनाओं का विश्लेषण नहीं करता| विश्लेषण में हमेशा तुलनात्मक दृष्टिकोण को अपनाता है|

(5) प्रत्यक्षवाद प्राकृतिक विज्ञान की पद्धति का अनुसरण कर ज्ञान प्राप्त करने में विश्वास रखता है|

(6) कॉम्टे प्रत्यक्षवादी सिद्धांत में तथ्य पर आधारित नैतिकता का समर्थन करते हैं|

प्रत्यक्षवाद का अध्ययन क्षेत्र एवं विषयवस्तु

प्रत्यक्षवाद अपने अध्ययन क्षेत्र और विषयवस्तु दोनों की सीमाएं बताता है| जहाँ तक भौतिक घटनाएँ हैं; इन्द्रियों की पहुँच में (किसी यन्त्र के उपयोग से भी) आ सकती हैं| वहां तक प्रत्यक्षवाद का अध्ययन क्षेत्र है| विषयवस्तु (अध्ययन-वस्तु) के अंतर्गत वे सारी घटनाएँ जो समाज में; समाज के कारण घटित होती है, प्रत्यक्षवाद के अध्ययन की वस्तु है|

नव-प्रत्यक्षवादी

प्रत्यक्षवाद की अगली पीढ़ी, जिसे नव-प्रत्यक्षवादी कहा जाता है; ने प्रत्यक्षवाद को और संकुचित कर दिया| उनके अनुसार ज्ञानेन्द्रियों की पहुँच से बाहर जो कुछ भी है; कारण हो या कार्य हम उसका अध्ययन नहीं करते|

दुर्खीम एवं प्रत्यक्षवाद

दुर्खीम ने अपने अध्ययन में प्रत्यक्षवाद को अपने चरम तक पहुंचा दिया| उन्होंने समाज के अध्ययन के लिए वैज्ञानिक पद्धति को वरीयता प्रदान की| उन्होंने प्राकृतिक घटनाओं की तरह समानता लाने के लिए; सामाजिक घटनाओं को वस्तु (Treat social phenomena as a thing) मानने पर बल दिया| प्राकृतिक घटनाओं एवं सामाजिक घटनाओं के अन्तर को नजरंदाज करने के पीछे दुर्खीम का उद्देश्य; वैज्ञानिकता को प्राप्त करना था|

प्रत्यक्षवाद की समीक्षा या आलोचना –

प्रत्यक्षवादियों एवं प्रत्यक्षवाद विरोधियों के बीच पद्धति सम्बन्धी विवाद; मैक्स वेबर के पद्धातिशास्त्रीय लेखन “सामाजिक क्रिया सिद्धान्त” (Social Action Theory) में दिखायी देने लगता है; जिसमे उन्होंने वस्तुनिष्ठता के साथ-साथ व्यक्तिनिष्ठता को भी पर्याप्त स्थान दिया|

सामाजिक क्रिया सिद्धान्त का प्रतिपादन वेबर ने; कर्ताओं की क्रियाओं की आतंरिक अवस्था को समझने के लिए किया था| जिसे वे verstehen कहते हैं|

उनके अनुसार मानव अपने तार्किक क्रियाओं के द्वारा ही सामाजिक विश्व को जैसा समझ पाता है; वैसा ही क्रिया करता है|

वेबर आगे लिखते हैं कि समाज वैज्ञानिकों को उस सामाजिक कर्ता, सामाजिक क्रिया, सामाजिक संगतियों का अध्ययन करना चाहिए; जो सार्थकता और उद्देश्यपूर्णता के प्रभाव से युक्त हो; तथा तार्किकता के आधार पर जिनके स्वरूपों का आदर्श प्रारूप बनाया जा सके|

प्रत्यक्षवाद की समीक्षा के रूप में हुसर्ल

प्रत्यक्षवाद की समीक्षा के रूप में हुसर्लका प्रघटनाशास्त्र आता है| अल्फ्रेड शुट्ज़ (Alfred Schutz) ने हुसर्ल एवं वेबर के विचारों का समन्वय कर समाजशास्त्रीय प्रघटनाशास्त्र की स्थापना करते हैं|

शुट्ज़ के अनुसार व्यक्ति एवं समाज की सत्ताएँ दूसरी अन्य सत्ताओं से भिन्न भी हैं; और उच्च-स्तरीय भी| इसमें ज्ञान-ज्ञाता-ज्ञेय के त्रिक पाए जाते हैं, जो चेतना के उच्च प्रमाण हैं|

शुट्ज़ आगे लिखते हैं कि ज्ञान सूचना से भिन्न होता है| इसका आधार यह है कि व्यक्ति का व्यक्तिगत अर्थ भी होता है; जबकि वस्तुओं में मात्र वस्तुनिष्ठ अर्थ| यही व्यक्तिनिष्ठ अर्थ विभिन्न रूप प्राप्त कर (typification) समाज का तत्व बनता है| यही कारण है कि मनुष्य का समाज प्रत्यक्षवाद की अध्ययन सीमा से कई स्तरों पर आगे है|

संरचनावादी एक अलग दृष्टि से यही बात करते है| उनके अनुसार चेतन समाज ने प्रत्ययों की कुछ श्रेणियां विकसित कर रखी है; जैसे- पति-पत्नी, मित्र-शत्रु आदि| इन्ही से समाज बना है| इनके पीछे जो चेतनाएं हैं; उनको समझा न जाय तो मानव एवं समाज दोनों का अध्ययन पूरा नहीं होगा| प्रत्यक्षवादी विधियाँ इन चेतनाओं का अध्ययन नहीं करती, इसलिए वे अधूरी हैं|

प्रत्यक्षवाद की अन्य आलोचनाएँ निम्न हैं-

(1) प्रत्यक्षवाद की पहली आलोचना यह है कि यह केवल वस्तुनिष्ठ पक्ष को समाहित करता है; जबकि मानवीय यथार्थ में केवल वस्तुनिष्ठ ही नहीं बल्कि व्यक्तिनिष्ठ (भावनात्मक) पक्ष भी होता है|

(2) प्रो. टीमाशेफ ने प्रत्यक्षवाद के अवलोकन एवं निष्कर्षीकरण को अपरिपक्व बताया; एवं इसके आधार पर सिद्धांत निर्माण को एक अनावश्यक छलाँग कहा है|

(3) काम्टे के अनुसार मनुष्य के व्यक्तिनिष्ठ पक्ष के कार्य-कारण सम्बन्ध का अध्ययन नहीं हो सकता; जबकि वेबर ने सामाजिक क्रिया सिद्धांत के माध्यम से इसे सम्भव कर दिखाया|

(4) रॉबिन चेम्बलिस ने कॉम्टे पर टिप्पणी करते हुए लिखा है कि; “प्रत्यक्षवाद का जनक ही अपने कार्यों में सबसे कम प्रत्यक्षवादी था|”

                          निष्कर्षतः कहा जा सकता है कि कॉम्टे का प्रत्यक्षवाद दोष मुक्त नहीं है; फिर भी प्रत्यक्षवादी दर्शन  के आधार पर अध्ययन सामाजिक घटनाओं को वैज्ञानिकता प्रदान करता है|

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