दहेज (Dowry)


दहेज को ऐतिहासिक रूप से देखें तो वैदिक काल में वैवाहिक मामलों में स्त्रियों के पुरुषों से अधिक अधिकार थे| स्त्रियों को जीवनसाथी चुनने की स्वतंत्रता थी| जिसके लिए स्वयंबर का आयोजन होता था| लेकिन मनुस्मृति की रचना के बाद हिंदू विवाह से संबंधित नियम स्थापित हो गए, जिसमें आठ प्रकार के विवाह की चर्चा है| इन आठ प्रकारों में एक ब्रह्म विवाह है| ब्रह्म विवाह के नियमानुसार लड़की का पिता विद्वान एवं चरित्रवान व्यक्ति को वर के लिए चुनता है तथा अपनी कन्या को उत्तम वस्त्रों एवं आभूषणों से अलंकृत कर कन्यादान देता है| मनुस्मृति का यही विधान समयान्तराल में वस्त्र और आभूषण देने की एक अनिवार्य प्रथा के रूप में प्रचलित हो गया और समय गुजरने के साथ वर पक्ष द्वारा कन्या पक्ष से आभूषण के साथ-साथ अन्य वस्तुओं की माँग की जाने लगी, जिससे दहेज जैसी कुप्रथा का जन्म हुआ|

फेयरचाइल्ड के अनुसार दहेज वह धन या संपत्ति है जो विवाह के अवसर पर लड़की के माता पिता या अन्य निकट संबंधियों द्वारा दी जाती है|

मैक्स रैडिन के अनुसार दहेज वह संपत्ति है जो एक पुरुष विवाह के समय अपनी पत्नी या उसके परिवार से प्राप्त करता है| (Max Radin defined dowry as the property, which a man receives from his wife or her family at the time of marriage)

दहेज निरोधक अधिनियम (Dowry Prevention Act) 1961 के अनुसार दहेज का अर्थ कोई ऐसी संपत्ति या मूल्यवान निधि है, जिसे –

(1) विवाह करने वाले दोनों पक्षों में से एक पक्ष ने दूसरे पक्ष को अथवा

(2) विवाह में भाग लेने वाले दोनों पक्षों में से किसी एक पक्ष के माता-पिता या किसी अन्य व्यक्ति ने दूसरे पक्ष अथवा उसके किसी व्यक्ति को, विवाह के समय, विवाह के पहले या विवाह के बाद विवाह की एक आवश्यक शर्त के रूप में दी हो अथवा देना स्वीकार किया हो|

दहेज एक समस्या के रूप में (Dowry as a Problem)

भारतीय हिंदू समाज विशेषकर उत्तर भारत में दहेज प्रथा का जो स्वरूप है, वह मनु स्मृति तथा शास्त्रीय भावनाओं से पूरी तरह भिन्न है, साथ ही समस्त मान्यताओं को गौण(secondary importance) मानते हुए आर्थिक लाभ को प्राथमिक महत्त्व दिया जाता है| वर्तमान में दहेज एक खानापूर्ति नहीं बल्कि सौदेबाजी का एक माध्यम भी है| यहाँ तक कि विवाह के नजदीक आ जाने पर भी यदि कोई अन्य पक्ष दहेज राशि अधिक देता है तो वैवाहिक रिश्ते को भी बदलते हुए लोग दिखायी पड़ते हैं|

ग्रामीण भारत में दो परिवारों के बीच तय किए गये विवाह में कोई इस बात की परवाह नहीं करता कि विवाह के संबंध में लड़का एवं लड़की क्या सोचते हैं? विवाह से वे क्या अपेक्षाएं रखते हैं? लड़का-लड़की

दो परिवारों के गठबंधन में केवल निमित्त मात्र होते हैं|प्रो. दीपांकर गुप्त अपनी पुस्तक मिस्टेकन मॉडर्निटी (Mistaken Modernity) में लिखते हैं कि परिवार द्वारा तय किए गये हिंदू विवाहों में बहुत स्थायित्व होता है जो अन्यत्र कहीं दिखाई नहीं देता| यह इसलिए नहीं कि परिवार द्वारा तय किये जाते हैं बल्कि इसलिए कि इस वैवाहिक संबंध में असमानता अंतर्निहित होती है|

लुई ड्यूमों (Louis Dumont) ने अपनी पुस्तक होमो हाइरारकिकस (Homo Hierarchicus) में विवाह के समय होने वाले पाँव पूजन रस्म का उल्लेख करते हैं, जिसमें वधू के पिता द्वारा विवाह के पूर्व वर के पैर की पूजा की जाती है, जो असमानता को स्थायित्व प्रदान करता है|

कन्या पक्ष से गंभीर दान का प्रारम्भ कन्यादान से शुरू होता है, इस बड़े दान को प्राप्त कर लेने के बाद भी दान एवं उपहार के रूप में मांग निरंतर जारी रहती है| यह केवल वस्तुओं एवं धन तक सीमित नहीं रहता बल्कि घर, फ्लैट, जमीन तक इसका दायरा बढ़ता हुआ दिखाई देता है|

इन उपहारों के आदान-प्रदान से दो परिवारों के बीच श्रेष्ठता एवं निम्नता की स्थापना हो जाती है| दहेज की माँग अथवा दहेज हत्या वास्तव में बहू प्रदानकर्ता एवं बहू प्राप्तकर्ता के संबंध में निहित श्रेष्ठता एवं निम्नता की भी अभिव्यक्ति है| इससे कुछ भौतिक वस्तुएं तो प्राप्त होती ही है साथ ही वधू के परिवार को निम्नता का एहसास कराना भी निहित होता है| यद्यपि ये कुरीतियाँ शिक्षित भारतीयों में धीरे-धीरे नाम मात्र ही सही, समाप्त हो रही है, फिर भी वर्तमान पर अतीत की कुछ मौलिक छाप अवश्य दिखाई देती है|

एक बात हैरान करने वाली है कि दहेज उत्पीड़न तथा हत्या के मामले में लड़के की माँ की प्राथमिक भूमिका होती है, इसका कारण है कि लड़के की माँ स्वयं लंबे समय तक अपने पति के परिवार की पूर्ण सदस्या नहीं बन पाई थी| पुत्र जन्म के बाद परिवार की सोच बदलती है लेकिन आदर्श अर्थों में स्त्री पूर्णता को तब प्राप्त करती है जब उसके बेटे के विवाह का समय आता है| इस समय महिला के प्रस्थिति में पूर्ण परिवर्तन आ जाता है| अब वह वधू-प्रदानकर्ता परिवार की सदस्य न होकर वधू प्राप्त-कर्ता परिवार की सदस्य हो जाती है| अब वह अन्य परिवार से वधू तथा उपहार प्राप्त करने की अधिकारिणी बन जाती है| यही कारण है कि महिलाएं पुत्री जन्म की जगह पुत्र जन्म की कामना करती है| पति के परिवार में अन्य सदस्यों की तुलना में निम्न प्रस्थिति से उबरने का उसके पास यही एक विकल्प उपलब्ध होता है|

जब लड़के की मां अपनी ही वधू के प्रति आक्रामक रुख रखती है तो यह अजीब सा लगता है कि एक स्त्री दूसरी स्त्री के साथ ऐसा कैसे कर सकती है| लेकिन उसकी आक्रामकता का कारण स्त्री होना नहीं, बल्कि वधू प्राप्तकर्ता के परिवार की सदस्य होना है, जिसका आधार कन्यादान में निहित होता है| यह उसी तरह जैसे- जब कोई छात्र इंजीनियरिंग या मेडिकल कॉलेज में एडमिशन लेता है तो उसे रैगिंग (ragging) के रूप में अनेक अवांछित समस्याओं को झेलना पड़ता है| लेकिन दो वर्ष बाद वही छात्र नये आगन्तुक छात्रों की रैगिंग लेना शुरू कर देता है| वास्तव में दहेज एवं रैगिंग को यदि व्यक्ति गलत समझता एवं प्रताड़ित होने के कारण इससे दिल से घृणा करता तो दहेज लेना एवं देना, रैगिंग करने एवं शिकार होने का सिलसिला इतिहास बन गया होता|

दहेज के कारण (Causes of Dowry)

(1) अपनी ही जाति में जीवनसाथी चुनने का सीमित क्षेत्र|

(2) हिंदुओं में कन्या के विवाह की अनिवार्यता|

(3) ऊंचे कुल या नौकरी, पेशे युक्त लड़कों से विवाह की प्रवृत्ति|

(4) धन का महत्त्व अधिक होना|

(5) शिक्षा एवं सामाजिक प्रतिष्ठा युक्त लड़के को महत्त्व|

(6) दहेज एक सामाजिक प्रथा के रूप में व्याप्त|

(7) काले धन की वृद्धि ने भी दहेज को बढ़ावा दिया है|

(8) विवाह के अवसर पर दिखावे के लिए अधिक से अधिक धन का अपव्यय|

दहेज का कुप्रभाव या दोष (Evil effects of Dowry)

(1) दहेज से नारियों की प्रस्थिति निम्न हो जाती है|

(2) भविष्य में दहेज की समस्या से बचने के लिए गर्भ में ही लिंग परीक्षण करवाकर बालिका भ्रूण हत्या को अन्जाम दिया जा रहा है|

(3) दहेज की पूर्ति न हो पाने के कारण विवाह के बाद भी स्त्रियों को अनेक यातनाएं झेलनी पड़ती है| जिससे परिवार विघटन का शिकार हो जाता है|

(4) दहेज की पूर्ति न कर पाने की स्थिति में बेमेल विवाह दिखाई देता है| मुंशी प्रेमचंद्र द्वारा लिखित उपन्यास निर्मला दहेज और बेमेल विवाह से हुए पारिवारिक विघटन को ही दर्शाता है|

(5) अधिक दहेज के कारण कभी-कभी कन्या का पिता इतना कर्ज ले लेता है जिसकी भरपाई उसकी आने वाली पीढ़ियों तक को करना पड़ता है|

(6) कन्या के लिए धन जुटाने के लिए परिवार को अपनी आवश्यकताओं में कटौती बहुत लंबे समय तक करनी पड़ती है जिससे परिवार का जीवन स्तर निम्न हो जाता है|

(7) दहेज इकट्ठा करने के लिए लोग घोटाला, गबन, अपराध, भ्रष्टाचार आदि करते हुए भी दिखाई देते हैं|

दहेज को समाप्त करने के सुझाव (Suggestion to eradicate Dowry)

(1) नारी शिक्षा को बढ़ावा दिया जाय, जिससे वे स्वयं आय अर्जित करने लगे एवं दहेज की समस्या से मुक्ति मिले|

(2) अंतर्जातीय विवाह को सामाजिक मान्यता मिले|

(3) दहेज निरोधक कानून का कड़ाई से पालन किया जाय|

(4) नारी भ्रूण हत्या एवं लिंग परीक्षण कानून को व्यावहारिक स्वरूप प्रदान किया जाय|

(5) लड़कों को भी बेहतर शिक्षा द्वारा स्वावलम्बी बनाया जाय, यदि योग्य एवं रोजगार युक्त वर समाज में अधिक संख्या में होंगे तो दहेज स्वयं ही कम या समाप्त हो जायेगा|

(6) जीवनसाथी चुनने की स्वतंत्रता हो, ऐसे में दहेज प्रथा समाप्त हो जाएगी|


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