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स्पेंगलर एवं टॉयनबी का सामाजिक परिवर्तन का चक्रिय सिद्धांत
(Spengler and Toynbee’s Cyclical theory of Social change)


जर्मन दार्शनिक ओसवाल्ड स्पेंगलर (Oswald Spengler) ने सामाजिक परिवर्तन का चक्रिय सिद्धांत प्रस्तुत किया| अपनी पुस्तक “दी डिक्लाइन आफ द वेस्ट” (The decline of the west) में उद्विकासीय सिद्धांत की आलोचना करते हुए कहते हैं कि परिवर्तन कभी भी रेखीय नहीं हो सकता| सामाजिक परिवर्तन चक्रिय ही होता है| उनके अनुसार जैसे मनुष्य जन्म, युवा, वृद्ध, मृत्यु तथा फिर जन्म के चक्रिय दौर से गुजरता है, उसी तरह संस्कृति एवं सभ्यता अर्थात समाज भी वृद्धि(growth) एवं क्षय(decay) के दौर से गुजरता है|

अपने चक्रिय सिद्धांत की पुष्टि के लिए स्पेंगलर ने विश्व की आठ सभ्यताओं का अध्ययन किया| वेे सभ्यताएँ बेबीलोन(Babylonian), इजिप्ट(Egyptian), चीनी(Chinese), भारतीय(Indian), मेसोअमेरिकी(Mesoamerican), शास्त्रीय(Classical), अरबी(Arabian), पश्चिमी(Western or Faustian) हैं| स्पेंगलर के अनुसार पश्चिमी सभ्यता अपने विकास के चरम रूप को प्राप्त कर चुकी है और अब यह पतन की ओर अग्रसर है| स्पेंगलर ने आदिम जनजातियों का अध्ययन नहीं किया, क्योंकि उनका मानना था कि आदिम जनजातीय समाज इतिहासविहीन(Historyless) है|

स्पेंगलर के अनुसार समाज में जब तक सांस्कृतिक विकास होता है, तब तक उसमें परिपक्वता आती रहती है| लेकिन जैसे ही संस्कृति, सभ्यता या भौतिकता का रूप लेने लगती है| उस समाज का पतन प्रारंभ हो जाता है| संस्कृति के अन्त के बाद नये विचार का पुनर्जन्म होता है, जिससे नए समाज का निर्माण होता है और इस तरह यह चक्र चलता रहता है| संस्कृति के चक्रिय परिवर्तन को स्पष्ट करने के लिए स्पेंगलर ने इसकी तुलना चार ऋतुुओं – वसंत(Spring), पतझड़(Autumn), सर्दी(Winter), गर्मी(Summer) से की| उनके अनुसार जिस तरह ऋतुुओं में परिवर्तन होता है उसी तरह संस्कृति में भी परिवर्तन होता है जो सामाजिक परिवर्तन के रूप में दिखायी देता है, और इस तरह परिवर्तन का चक्र चलता रहता है|

 

अर्नाल्ड टॉयनबी का चक्रिय सिद्धांत (Cyclical theory of Arnold Toynbee)

टॉयनबी ने अपनी पुस्तक “ए स्टडी ऑफ हिस्ट्री” (A study of History) में सामाजिक परिवर्तन का चक्रिय सिद्धांत प्रस्तुत किया| उनके अनुसार प्रत्येक सभ्यता को प्रकृति एवं मनुष्य द्वारा चुनौती मिलती है|जो चुनौतियों का प्रतिउत्तर देने में सफल रही, वे बच गई एवं जो प्रतिउत्तर नहीं दे पाई, वे नष्ट हो गई| इसीलिए इनके सिद्धांत को चुनौती एवं प्रतिउत्तर(Challenge and response theory) का सिद्धांत कहा जाता है| उन्होंने सभ्यता के स्थिरता, विकास एवं पतन के आधार पर परिवर्तन की व्याख्या की|
टॉयनबी के अनुसार सभ्यता को भौगोलिक एवं सामाजिक दोनों चुनौतियों का सामना करना पड़ता है| भौगोलिक के अंतर्गत प्राकृतिक आपदाएं शामिल है, जबकि सामाजिक में आंतरिक एवं वाह्य दोनों प्रकार की चुनौती मिलती है| आंतरिक को दो समूहों के बीच तनाव के रूप में देखा जाता है, जबकि बाह्य के अंतर्गत आक्रमण आदि सम्मिलित हो जाते हैं| जिस सभ्यता के लोग इन चुनौतियों के साथ अनुकूलन कर लेते हैं, वे सभ्यता एवं संस्कृति का निर्माण करते हैं तथा वे सभ्यताएँ बच जाती हैं एवं जो अनुकूलन नहीं कर पाते, वे सभ्यताएँ नष्ट हो जाती हैं|

टॉयनबी ने विश्व की 21 प्रमुख सभ्यताओं का अध्ययन किया एवं केवल 5 सभ्यताओं को ही जीवित पाया|
टॉयनबी के अनुसार जो सभ्यताएं चुनौतियों का प्रतिउत्तर देने में सफल हुई वे जीवित रह गई| तात्पर्य है कि जो अनुकूलन करने में सफल रही वे जीवित रह गई एवं जो अनुकूलन नहीं कर पाई, वे नष्ट हो गई| इस तरह से समाज निर्माण एवं विनाश, संगठन एवं विघटन के दौर से गुजरता है|


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