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सोरोकिन का सामाजिक परिवर्तन का सिद्धांत
(Sorokin’s Theory of Social change)


सोरोकिन ने अपनी पुस्तक सोशल एण्ड कल्चरल डायनमिक्स (Social and cultural dynamics) में सामाजिक परिवर्तन के सांस्कृतिक गतिशीलता का सिद्धांत प्रस्तुत किया| उनके अनुसार संस्कृति एक सामूहिक मनोवृत्ति हैं, जो पूरे समाज में व्याप्त रहती है| जब संस्कृति अर्थात सामूहिक मनोवृत्ति में परिवर्तन होता है, तो समाज में भी परिवर्तन दिखाई देता है|

सोरोकिन आगे लिखते हैं कि सामाजिक परिवर्तन एक पेन्डुलम की भांति एक अवस्था से दूसरी अवस्था के बीच परिवर्तित होता रहता है| उन्होंने मुख्य रूप से दो संस्कृतियों का उल्लेख किया – भावात्मक एवं चेतनात्मक| लेकिन परिवर्तन के चक्र में एक स्थिति ऐसी भी आती है जहाँ भावात्मक एवं चेतनात्मक दोनों संस्कृतियों का मिश्रण दिखाई देता है| इसे सोरोकिन आदर्शात्मक संस्कृति कहते हैं| सोरोकिन यूनानी संस्कृति का अध्ययन कर संस्कृति की तीन अवस्थाओं – भावात्मक, चेतनात्मक एवं आदर्शात्मक का उल्लेख करते हैं|

1. भावात्मक संस्कृति (Ideational Culture)

इसका संबंध विचार, भावना, नैतिकता, आत्मा, धर्म, ईश्वर आदि से होता है| इस संस्कृति में आध्यात्मिक या अलौकिक तत्वों की प्रधानता होती है| इन्हीं अलौकिक विचारों के आस-पास सम्पूर्ण सामाजिक जीवन संचालित होता रहता है| प्रथाओं एवं परम्पराओं को अधिक महत्त्व दिया जाता है| इस संस्कृति का उद्देश्य धर्म दर्शन एवं मोक्ष की खोज करना है|

2. चेतनात्मक संस्कृति (Sensate Culture)

यह संस्कृति भावात्मक संस्कृति के विपरीत मूल्यों एवम् विश्वासों को प्रदर्शित करती है| इसमें भौतिक मूल्य महत्त्वपूर्ण होते हैं| इस संस्कृति में इंद्रिय आवश्यकताओं एवं इच्छाओं की पूर्ति पर अधिक बल दिया जाता है| इसमें धर्म, नैतिकता तथा परम्पराओं को महत्त्व नहीं दिया जाता| अविष्कारों, भौतिकता एवं विलासिता की वस्तुओं का महत्त्व अधिक होता है| यह संस्कृति सुविधाओं को प्राप्त करने के अपने प्रयास में प्रौद्योगिकी का विस्तार चाहती है, ता कि भौतिक सुखों की प्राप्ति हो सके|

3. आदर्शात्मक संस्कृति (Idealistic Culture)

भावात्मक एवं चेतनात्मक संस्कृतियों के बीच एक स्थिति ऐसी भी आती है, जोे दोनों संस्कृतियों का मिश्रण प्रदर्शित करती है| इसे ही सोरोकिन ने आदर्शात्मक संस्कृति कहते हैं| इस संस्कृति में विज्ञान, साहित्य, कला, दर्शन, आध्यात्मिकता किसी की भी उपेक्षा नहीं की जाती| सोरोकिन इस प्रकार की संस्कृति को उत्तम मानते हैं| इसीलिए इसे आदर्शात्मक संस्कृति कहते हैं|

उपर्युक्त आधार पर सोरोकिन कहते हैं कि प्रत्येक समाज में समय विशेष में एक संस्कृति का प्रभाव रहता है, तो दूसरे समय में दूसरी संस्कृति का| प्रत्येक समाज इन्हीं दो संस्कृतियों – भावात्मक एवं चेतनात्मक के बीच घूमता रहता है| इन्ही दो चरम संस्कृतियों के बीच जो सांस्कृतिक मनोेवृत्तियों का परिवर्तन होता है, वही सामाजिक परिवर्तन है|

आलोचना –

(1) आलोचकों के अनुसार सोरोकिन यह स्पष्ट नहीं करते कि सांस्कृतिक मनोवृत्तियाँ बदलती कैसे हैं?

(2) इस बात का कोई प्रमाण नहीं है कि सभी समाज एक प्रकार की संस्कृति से दूसरे प्रकार की संस्कृति के बीच ही परिवर्तित होता रहता है|

(3) सोरोकिन, सांस्कृतिक परिवर्तन की दिशा, समय एवं निश्चित आधार को भी स्पष्ट नहीं कर पाते|

कुछ आलोचनाओं के बावजूद सोरोकिन का यह सिद्धांत समाजशास्त्रीय महत्त्व रखता है| वर्तमान समय में देखें तो अमेरिका का आध्यात्म के प्रति सम्मान और भारत का भौतिक वस्तुओं के प्रति आकर्षण दोनों संस्कृतियों तक पहुंचने का प्रयास ही है|


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