प्रतीकात्मक अंत:क्रियावाद
(Symbolic Interactionism)


प्रतीकात्मक अंत:क्रियावाद समाज को स्थाई स्वरूप के रूप में देखने के प्रतिक्रिया स्वरूप अस्तित्व में आया| प्रतीकात्मक अंतःक्रियावाद के अनुसार समाज गतिशील है, समाज को निर्मित करने वाली सामाजिक क्रियाएं एवं भूमिकाएँ बदलती रहती है| इसलिए समाज का अध्ययन संरचनावादी दृष्टिकोण से न करके प्रक्रियावादी दृष्टिकोण से करना यथार्थ के ज्यादा नजदीक है|

प्रतीकात्मक अंतःक्रियावाद के अनुसार प्रतीकों के माध्यम से ही व्यक्ति एक दूसरे से अंतःक्रिया करता है| प्रतीकों के अभाव में मानवीय अंतःक्रिया सम्भव नहीं है| प्रतीक का सर्वश्रेष्ठ उदाहरण भाषा है| भाषा सामाजिक संपर्क एवं संचार का महत्वपूर्ण साधन है, जिसके माध्यम से एक व्यक्ति दूसरे को प्रभावित करता है एवं प्रभावित होता है, इसलिए समाज दिन-प्रतिदिन के लोगों के बीच की अंतःक्रिया का परिणाम है|

प्रतीकात्मक अंतःक्रियावाद शब्द का सर्वप्रथम प्रयोग हरबर्ट ब्लूमर (Herbert Blumer) ने किया| लेकिन इसकी औपचारिक शुरुवात जी.एच. मीड ( पढ़ेंमीड का  समाजीकरण का सिद्धांत ) से मानी जाती है| मीड ने विलियम जेम्स (William James), जॉन डेवे (John Dewey), सी.एच. कूले (C.H. Cooley) के विचारों को समन्वित कर प्रतीकात्मक अंतःक्रियावाद को सैद्धांतिक स्वरूप प्रदान किया|

मीड की पुस्तक माइंड सेल्फ एंड सोसाइटी (Mind Self And Society) में प्रतिकात्मक अन्त:क्रिया के लिए संचार को आधार माना गया है| मीड के अनुसार समाज का आधार प्रतीक है, इन प्रतीकों को हम दिन-प्रतिदिन के सूक्ष्म अन्तःक्रिया के अनुभव द्वारा सीखते हैं एवं इसकी व्याख्या करते हैं, जो हमारे आस-पास की दुनिया के बारे में हमारी समझ विकसित करता है|

मीड के अनुसार सोचना एक प्रकार का आंतरिक वार्तालाप (Internal dialogue) है| इस आंतरिक वार्तालाप को मीड मन (Mind) कहते हैं| मन की अवधारणा को मीड एक प्रक्रिया मानते हैं| सोचने की क्षमता व्यक्ति में सर्वप्रथम कैसे विकसित होती है, इसके लिए मीड कहते हैं कि मन एक चयन करने की प्रक्रिया से विकसित होता है| जिसके अंतर्गत एक बच्चा संकेतों (gesture) को ग्रहण करता है|

जो संकेत सकारात्मक प्रतिक्रिया देते हैं, उनका एक साझा अर्थ होता है, जो बच्चे एवं इसके पर्यावरण दोनों के लिए सामान्य होता है| इन संकेतों के माध्यम से ही बच्चा अन्य की भूमिकाओं का काल्पनिक क्रिया करता है| मीड के अनुसार यही मन है|

स्वः (Self) का तात्पर्य उस प्रक्रिया से है जिसमें व्यक्ति स्वयं को वस्तु (Object) के रूप में देखकर प्रतिक्रिया करता है| संकेतों के आधार पर व्यक्ति अपना मूल्यांकन करता है| अंतःक्रिया की प्रक्रिया में स्वयं मूल्यांकन से व्यक्ति की जो छवि (Image) बनती है| यही स्वः (Self) है|

स्व: कैसे विकसित होता है? इसके लिए मीड तीन अवस्थाओं का उल्लेख करते हैं –

(1) नकल की अवस्था (Imitation Stage)

(2) नाटक की अवस्था (Play Stage)

(3) खेल की अवस्था (Game Stage)

स्वः, व्यक्ति और समाज को जोड़ने वाली कड़ी है| संचार के माध्यम से ही यह कड़ी स्थापित होती है|

समाज (Society)

समाज का निर्माण बिना मन (Mind) एवं स्वः (Self) के नहीं हो सकता| मीड के अनुसार समाज का तात्पर्य विभिन्न लोगों के बीच संगठित एवं निश्चित अंतःक्रिया है| अंतःक्रिया का संगठन, मन पर निर्भर करता है जब तक मन भूमिका ग्रहण करने की एक काल्पनिक छवि मन में नहीं बनाता, तब तक व्यक्तियों की क्रियाओं में सहयोग नहीं हो सकता|

समाज स्वः की क्षमता पर भी निर्भर करता है, मुख्य रूप से अन्य के विचार के संदर्भ में स्वयं के मूल्यांकन की महत्त्वपूर्ण भूमिका होती है| मनुष्यों में अंतःक्रिया के पर्यावरण में हस्तक्षेप करने की क्षमता होती है, इसलिए एक साथ अनेक समाज अस्तित्व में रहते हैं|

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