Rajendra Singh

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    प्रतीकात्मक अन्तःक्रियावाद के अनुसार समाज, व्यक्ति के दिन-प्रतिदिन के सामाजिक अंतःक्रिया का परिणाम है| यह अंतःक्रिया प्रतीकों के माध्यम से होती है| प्रतीक का एक उदाहरण भाषा है| चूँकि प्रतीकों के आधार पर व्यक्ति की भूमिकाएँ बदलती रहती है इसलिए प्रतीकात्मक अंतःक्रिवाद समाज को गतिशील मानता है|

    अधिक जानकारी के लिए पढ़ें –

    प्रतीकात्मक अंत:क्रियावाद(Symbolic Interactionism)

    ब्लूमर का प्रतीकात्मक अन्तःक्रियावाद(Blumer’s Symbolic Interactionism)

    Rajendra Singh
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    सामाजिक संरचना के भीतर लोगों के बीच जो संबंध पाए जाते हैं उन्ही संबंधों को समाज कहते हैं, जैसा कि मैकाइवर एवं पेज ने भी कहा है, समाज सामाजिक संबंधों का जाल है| चूँकि सामाजिक संबंधों को ही समाज कहते हैं और सामाजिक संबंध हमें दिखाई नहीं देता| इसलिए समाज अमूर्त (Abstract) होता है|

    Rajendra Singh
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    सामाजिक संरचना के भीतर लोगों के बीच जो संबंध पाए जाते हैं, इन्हीं संबंधों को हम समाज कहते हैं| चूँकि सामाजिक संबंध हमें दिखाई नहीं देते, इसलिए समाज अमूर्त(Abstract) होता है| लेकिन कभी- कभी हम व्यक्तियों के समूह को भी समाज कहते हैं, जैसे – मजदूरों का समाज, विदेशियों का समाज, आर्य समाज आदि| तब इसे हम ‘एक समाज’ कहते हैं| चूँकि यह समाज हमें दिखाई देता है इसलिए ‘एक समाज’ मूर्त(Concrete) होता है|

    अधिक जानकारी के लिए यहाँ क्लिक करें – समाज (Society)

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