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पुनर्जन्म का कारण एवं कर्म का सिद्धांत (Doctrine of Karma)

Karm ka siddhant

कर्म क्या है –

कर्म का तात्पर्य क्रिया या कार्य से है| कर्म सिद्धांत के अनुसार मनुष्य जो भी कार्य करता है उसे उसका फल अवश्य प्राप्त होता है| वह अपने जीवन में जो सुख या दुख भोगता है वह उसके कर्मो का ही फल है| व्यक्ति के कर्म ही उसकी सामाजिक, आर्थिक, पारिवारिक आदि स्थितियों का निर्धारण करते हैं| जीव को अपने अच्छे बुरे कर्मों का फल भुगतने के लिए फिर से जन्म लेना पड़ता है| इसलिए कर्म का सिद्धांत प्रत्यक्ष रुप से पुनर्जन्म से जुड़ा है|

कर्म के सिद्धांत की पूर्व मान्यता

(1) संपूर्ण विश्व कारण-कार्य के नियम पर आधारित है – इसके अनुसार मनुष्य जो कुछ सोचता और करता है, उसके अनिवार्य रूप से परिणाम उत्पन्न होंगे| अकारण ही कोई घटना नहीं घटती| इससे स्पष्ट है कि वर्तमान में यदि कोई व्यक्ति सुख या दुःख भोग रहा है तो वह अतीत में उसके द्वारा किये गये कर्मों का अनिवार्य परिणाम है| अतः कर्म और उसके फल की प्रक्रिया कारण और उसके कार्य के अनिवार्य नियम द्वारा संचालित होती है|

(2) मनुष्य कर्म करने या न करने के लिए स्वतंत्र है – इस मान्यता के अनुसार मनुष्य कर्म करने एवं न करने के लिए स्वतंत्र है, इसलिए वह अपने अच्छे या बुरे कर्म के लिए स्वयं जिम्मेदार है तथा अपने भाग्य का निर्माता वह स्वयं है|

भारतीय धर्म शास्त्रों में फल की इच्छा की दृष्टि से कर्म के दो प्रकार

(1) काम्य कर्म (2) निष्काम कर्म

(1) काम्य कर्म – काम्य कर्म वह कर्म है, जिसे मनुष्य किसी विशेष कामना या इच्छा से प्रेरित होकर करता है|

(2) निष्काम कर्म – निष्काम कर्म वह कर्म है जिसे व्यक्ति बिना किसी फल की इच्छा के करता है| सामाजिक हित या लोक कल्याण के लिए किए गए कार्य निष्काम कर्म के अंतर्गत शामिल होते हैं|

कर्म फल प्राप्ति की दृष्टि से कर्म के तीन प्रकार

(1) प्रारब्ध कर्म (2) संचित कर्म (3) क्रियमाण कर्म

(1) प्रारब्ध कर्म – वे कर्म जो मनुष्य पहले कर चुका है और जिनका फल वह वर्तमान में भोग रहा है|

(2) संचित कर्म – संचित कर्म वे कर्म हैं जो व्यक्ति अपने पूर्व जन्म में कर चुका है एवं जिसके फल की प्राप्ति अभी प्रारम्भ नहीं हुयी है|

(3) क्रियमाण कर्म – यह वह कर्म है जिसे मनुष्य वर्तमान जीवन में कर रहा है एवं जिसका फल उसे भविष्य में प्राप्त होगा|

गीता में कहा गया है कि कर्म करना तुम्हारा कर्तव्य है, फल की आशा मत करो| गीता में ही कर्म, अकर्म तथा विकर्म की चर्चा की गयी है| कर्म का तात्पर्य व्यक्ति द्वारा किया गया कार्य है| अकर्म का तात्पर्य निष्काम कर्म से है अर्थात् बिना फल की इच्छा के कर्म करना| जबकि विकर्म का तात्पर्य जिन कर्मों को व्यक्ति अन्य किसी मोह या लोभ के कारण छोड़ देता है|

कर्म के कारण पुनर्जन्म का चक्र चलता रहता है

पुनर्जन्म का कारण –

कर्म का सिद्धांत मानने से पुनर्जन्म को स्वीकार करना आवश्यक हो जाता है| क्योंकि कर्म फल को भोगने के लिए व्यक्ति को बार-बार जन्म लेना पड़ता है| पतंजलि योग सूत्र में पुनर्जन्म का कारण अविद्या अर्थात् अज्ञानता को माना गया है| यह पाँच प्रकार की होती है –

(1) विभ्रम – स्वयं और प्रकृति को मानने की अज्ञानता|

(2) अस्मिता – शरीर और आत्मा में विभेद न कर पाना|

(3) द्वेष – दु:ख होने पर उससे बचने की इच्छा द्वेष है|

(4) राग – विषयों ले लगाव रखना|

(5) अभिनिवेष – जीवन के प्रति मोह एवं मृत्यु से भयभीत|

पुनर्जन्म के बंधन से मुक्ति का मार्ग –

  • पतंजलि के अनुसार कर्म योग द्वारा व्यक्ति की अज्ञानता के दूर होते ही अविद्या नष्ट हो जाती है, एवं मनुष्य पुनर्जन्म के बंधन से मुक्त हो जाता है|
  • आचार्य शंकर के अनुसार ब्रह्म ज्ञान होने से व्यक्ति मोक्ष को प्राप्त कर लेता है l
  • गीता के अनुसार बन्धन कर्म-फल के प्रति व्यक्ति का मोह है, जब व्यक्ति ज्ञान और भक्ति द्वारा इन बन्धनों से छूट जाता है तब वह ब्रह्म को प्राप्त करता है| इस तरह वह जन्म और पुनर्जन्म के बन्धन से मुक्त हो जाता है|
  • बौद्ध धर्म में द्वादश चक्र के माध्यम से समस्त भौतिक दुःखों का कारण अविद्या (अज्ञानता) को माना गया है| अविद्या या अज्ञानता के नष्ट होते ही व्यक्ति जन्म-मृत्यु के चक्र से मुक्त हो जाता है|

Objective Type Questions


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