फ्रायड का समाजीकरण का सिद्धांत
(Freud’s Theory of Socialization)


फ्रायड के सिद्धांत को समाजीकरण का मनोविश्लेषक (Psycho-analytical) सिद्धांत भी कहा जाता है| फ्रायड के समाजीकरण सिद्धांत की मूल विशेषता यह है कि जहाँ कूले एवं मीड समाज एवं स्व: के बीच सह संबंध देखते हैं, वहीं फ्रायड समाज एवं स्व: के बीच मौलिक विरोध के परिणाम स्वरूप समाजीकरण की प्रक्रिया को स्वीकार करते हैं| फ्रायड ने व्यक्तित्व के तीन तत्त्व – इद, अहम् , परा-अहम् (Id, Ego, Super-ego) को समाजीकरण का आधार मानते हैं|

फ्रायड के अनुसार इद व्यक्तित्व का आधार है, जो समस्त आनुवंशिक संसाधनों को निहित करता है, विशेषकर सहज प्रवृत्ति (Instinct) को| इद ही व्यक्तित्व का वह मौलिक तत्त्व है जिससे अन्य दो तत्त्व अहम् तथा परा-अहम् का निर्माण होता है| इद मस्तिष्क का अचेतन (Un-concious) भाग है और जैवकीय प्रक्रियाओं से घनिष्ठ रूप से जुड़ा होता है|

इद सहज प्रवृत्ति है जो स्वयं को संतुष्ट करने का प्रयास करती है| फ्रायड अपनी पुस्तक बियॉन्ड द प्लेजर प्रिंसिपल (Beyond The Pleasure Principle) में दो तरह के सहज प्रवृत्ति की चर्चा करते हैं –

(1) यौन सहज प्रवृत्ति (Sexual Instincts or Eros)

फ्रॉयड इसे जीने की प्रेरणा (Life Instinct) भी कहते हैं| इसका तात्पर्य उन प्रेरणाओं से है जो जीवन, सुख एवं पुनरुत्पादन (survival, pleasure and reproduction ) से संबंधित है| ये सहज प्रेरणाएँ जीने के लिए एवं प्रजाति की निरंतरता बनाए रखने के लिए आवश्यक है| इन सहज प्रेरणाओं में भूख एवं प्यास भी सम्मिलित है| इस लाइफ इन्सटिंक्ट के द्वारा जो भी ऊर्जा उत्पन्न होती है उसे फ्रायड लीबिडो (Libido) कहते हैं|

(2) मृत सहज प्रवृत्ति (Death Instinct or Thanatos)

फ्रायड कहते हैं कि मनुष्य अपने आक्रामकता के कारण डेथ इंस्टिंक्ट की तरफ बढ़ता है| यह सहज प्रवृत्ति व्यक्ति को आंतरिक रूप से विनाश की ओर ले जाती हैं, जिसका परिणाम स्वयं के नुकसान या आत्महत्या में होता है|

इद की इच्छाएँ अनन्त एवं सभी इच्छाएँ समाज सम्मत न होने के कारण पूर्ण नहीं हो सकती| इद अपनी इच्छा की पूर्ति के लिए परा-अहम् अर्थात् समाज से संघर्ष करता है लेकिन इद को यह एहसास हो जाता है कि परा-अहम् को नजरन्दाज नहीं किया जा सकता| अतः इद अपनी ऊर्जा में इस तरह परिवर्तन करता है जो समाज को स्वीकार्य हो| इस ऊर्जा परिवर्तन को फ्रायड ऊर्जा का मुक्तिकरण (release of Energy) कहते हैं| स्वयं को समाज के अनुसार परिवर्तन के बाद इद ही अहम् में परिवर्तित हो जाता है|

इस तरह इद तथा परा-अहम् के बीज पारस्परिक संघर्ष की प्रक्रिया में ही अहम् का निर्माण अर्थात् व्यक्ति का समाजीकरण होता है|

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