सामाजिक परिवर्तन से सम्बन्धित विभिन्न अवधारणाएँ
(Concepts relating to Social Change)

उद्विकास (Evolution)

उद्विविकास का तात्पर्य समाज का धीमा, क्रमिक एवं एक निश्चित दिशा में होने वाला परिवर्तन है| यह एक आंतरिक परिवर्तन (Endogenous Change) होता है| इसे नियत परिवर्तन (Orthogenetic Change) भी कहते हैं| इसमें समाज क्रमशः एक अवस्था से दूसरे एवं दूसरे से तीसरे में परिवर्तित होता है, जैसे – जनजातीय समाज से कृषक समाज, कृषक से औद्योगिक, औद्योगिक से उत्तर-औद्योगिक समाज|

मैकाइवर एवं पेज (Maciver and Page) के अनुसार जब परिवर्तन में केवल निरंतरता ही न हो, बल्कि परिवर्तन की दिशा भी हो, तो हमारा तात्पर्य उद्वविकास से होता है | (When there is not only the continuity of change, but direction of change, We mean evolution)

उद्विकासीय परिवर्तन की दिशा सरल से जटिल (Simple to Complex), समरूपता से विषमरूपता (Homogeneity to Heterogeneity), असम्बद्धता से सम्बद्धता (Un-coordination to Coordination), अनिश्चितता से निश्चितता (Uncertainity to Certainity) की ओर होता है|

समाजशास्त्र में सर्वप्रथम हरबर्ट स्पेन्सर (Herbert Spencer) ने सामाजिक उद्विकास (Social evolution) की अवधारणा का प्रतिपादन किया| जिसके आधार के रूप में स्पेन्सर ने डार्विन के उद्धविकासीय सिद्धांत को अपनाया| डार्विन ने अपनी पुस्तक ओरिजिन ऑफ स्पेसीज (Origin of Species) में जानवरो और पौधों के बारे में उद्धविकासीय सिद्धांत की व्याख्या की| स्पेन्सर के अनुसार उद्विकास की प्रक्रिया केवल जैवकीय परिवर्तन में ही नहीं बल्कि सामाजिक क्षेत्र के परिवर्तन में भी होता है|

स्पेन्सर के अनुसार संपूर्ण ब्रह्नाण्ड निश्चित नियमों से संचालित  होता है और यह नियम उद्विकास का नियम है, जिसके द्वारा प्रकृति एवं समाज दोनों का अनुरक्षण एवं परिवर्तन होता है| स्पेन्सर के अनुसार उद्विकास कुछ तत्त्वों का एकीकरण तथा उससे संबंधित वह गति है जिसके दौरान कोई तत्त्व अनिश्चित और असंबद्ध समानता से निश्चित और संबद्ध भिन्नता में बदल जाता है|

प्रगति (Progress)

प्रगति का तात्पर्य समाज में होने वाले सचेष्ट, वांछनीय एवं नैतिक परिवर्तन से है| यह परिवर्तन अधिक बेहतर सामाजिक जीवन, समृद्ध संस्कृति तथा ऊर्ध्वमुखी (upward) की ओर होता है, यदि नीचे की तरफ (downward) परिवर्तन हो या ह्रास (decline) हो तब इसे हम प्रगति नहीं कह सकते| ऑगबर्न (Ogburn) कहते हैं कि प्रगति का अर्थ अच्छाई के लिए परिवर्तन है|

वांछनीय (Voluntarily) होने से प्रगति की अवधारणा में सचेष्ट मानवीय प्रयास या हस्तक्षेप निहित हो जाता है, चाहे इसकी मात्रा कम हो या अधिक, प्रत्यक्ष हो या अप्रत्यक्ष|

नैतिकता से जुड़े होने के कारण प्रगति की अवधारणा समाज या राष्ट्र की वैचारिकी से सम्बद्ध होता है| क्योंकि जो परिवर्तन एक समाज के लिए अच्छा है वह आवश्यक नहीं कि दूसरे समाज के लिए भी अच्छा हो या हो सकता है कि वह दूसरे समाज की दृष्टि से बुरा हो| इसलिए प्रगति मूल्य सापेक्ष होती है तथा समय एवं स्थान के सापेक्ष यह अवधारणा बदलती रहती है|

विकास (Development)

सामान्यतः विकास का अर्थ सकारात्मक भौतिक परिवर्तन से होता है| समाजशास्त्र में विकास का तात्पर्य सामाजिक विकास से है| जिसमें आर्थिक विकास का भाव निहित होता है| बोटोमोर ने विकास को दो विशेषताओं के आधार पर व्याख्यायित किया –

(1) ज्ञान में वृद्धि (Increase in knowledge)

(2) मनुष्य का प्रकृति पर नियंत्रण में वृद्धि (Increase control of man over nature)

वर्तमान में विकास शब्द का प्रयोग उन परिवर्तन को व्यक्त करने के लिए किया जाता है जिसमें कोई अल्प विकसित समाज, आधुनिक या विकसित समाज की अवस्था प्राप्त करने का प्रयास करता है| विकास के अंतर्गत सभी भौतिक वस्तुएँ एवं सहूलियतें शामिल हो जाती हैं, जैसे – मकान, वाहन, सड़क, विलासिता की वस्तुएँ आदि|

संस्कृतिकरण (Sanskritization)

जाति व्यवस्था को सामान्यत: एक बंद व्यवस्था के रूप में देखा जाता था| लेकिन प्रोफेसर एम. एन. श्रीनिवास (M.N.Srinivas) ने अपनी पुस्तक रिलिजन एंड सोसाइटी एमंग दी कुर्ग्स ऑफ साउथ इंडिया (Religion and Society among the Coorgs of South India) में जाति व्यवस्था में होने वाली गतिशीलता को रेखांकित किया एवं इसे संस्कृतिकरण नाम दिया|

श्रीनिवास ने पाया कि दक्षिण भारत के कुर्ग लोगों में निम्न जातियां अपनी प्रस्थिति (Status) में सुधार की दृष्टि से स्वयं के प्रदूषित तथा निम्न समझी जाने वाली क्रियाओं जैसे – मांस खाना, चमड़े का कार्य, मदिरा सेवन आदि त्याग देती हैं तथा अपने से उच्च जातियों के रीति-रिवाज, रहन-सहन, कर्मकांडो तथा मूल्यों को अपनाने लगती हैं| श्रीनिवास ने इस सामाजिक प्रक्रिया को संस्कृतिकरण से संबोधित किया| इस परिवर्तन के बाद निम्न जातियां, जातीय संस्तरण में अपनी स्थिति उच्च जातीय स्थिति के समान होने का दावा करने लगती हैं|

श्रीनिवास के अनुसार संस्कृतिकरण की प्रक्रिया में केवल पदमूलक परिवर्तन (Positional Change) होता है अर्थात् एक जाति अपने पास की जातियों से जातीय स्थित में ऊपर उठ जाती हैं| इसमें जाति व्यवस्था परिवर्तित नहीं होती, बल्कि परिवर्तन जाति के अंदर होता है| डी.एन. मजूमदार ने संस्कृतिकरण को और स्पष्ट करते हुए लिखा है कि इस प्रक्रिया में कोई निम्न जाति लम्बवत् रुप से ऊपर नहीं उठ जाती या उच्च जातियों के समान नहीं बन जाती बल्कि अपने ही समान स्तर की अन्य जातियों से या अपनी ही जाति की विभिन्न उप-शाखाओं से कुछ ऊपर उठ जाती हैं| वास्तव में भारतीय जाति व्यवस्था परम्परा एवं धर्म पर आधारित व्यवस्था है| अत: ऐसी बंद व्यवस्था वाले समाज में किसी जाति समूह का पूरी तरह दूसरी जातीय समूह की सदस्यता ग्रहण करना संभव नहीं है|

संस्कृतिकरण की प्रक्रिया कुछ जातियों तक सीमित नहीं है| यह जनजातियों में भी दिखाई देती है, उदाहरण के रूप में पश्चिमी भारत के भीलों एवं मध्य भारत के गोण्डों में भी यह प्रक्रिया पाई जाती है| जिसके परिणाम स्वरुप जिस जनजाति में संस्कृतिकरण होता है वही जाति पटल पर आने लगती है और स्वयं हिंदू होने का दावा करने लगती है|

बाद में जब श्रीनिवास ने रामपुर में प्रभु जाति (Dominant Caste) की प्रघटना का अध्ययन किया तो उन्होंने पाया कि संस्कृतिकरण में जातीय गतिशीलता का संदर्भ उच्च जाति न होकर प्रभु जाति होती है, तथा प्रत्येक निम्न जाति, प्रभु जाति की जीवन-शैली को अपनाकर प्रभु जाति की स्थिति को प्राप्त करना चाहती है|

पश्चिमीकरण (Westernization)

पश्चिमी देशों की संस्कृति के संपर्क में आने से भारतीय समाज एवं संस्कृति के विभिन्न पक्षों में होने वाले परिवर्तन को पश्चिमीकरण कहते हैं| इसके अंतर्गत भौतिक एवं अभौतिक दोनों परिवर्तन शामिल हो जाते हैं| पश्चिमीकरण एक मूल्य तटस्थ (Value neutral) अवधारणा है, जो इस बात को निहित नहीं करता कि होने वाला परिवर्तन अच्छा है या बुरा| यह केवल परिवर्तन को इंगित करता है|

प्रो. श्रीनिवास ने पश्चिमीकरण की अवधारणा का प्रयोग विशिष्ट अर्थों में किया| उनके अनुसार पश्चिमीकरण का तात्पर्य भारतीय समाज व संस्कृति में 150 वर्षों से अधिक समय के अंग्रेजी हुकूमत के परिणाम स्वरुप उत्पन्न हुए परिवर्तन से हैं|

इस तरह पश्चिमीकरण का तात्पर्य केवल पाश्चात्य रीति-रिवाज, रहन-सहन आदि को अपनाना ही नहीं बल्कि इसके अंतर्गत विज्ञान, तकनीक, प्रौद्योगिकी, मूल्य आदि में परिवर्तन शामिल हो जाते हैं|पश्चिमीकरण के अनेक मॉडल हो सकते हैं, जैसे – ब्रिटिश मॉडल, अमेरिकी मॉडल तथा विभिन्न यूरोपीय देशों के प्रारुप सम्मिलित हैं, जिसका प्रभाव आर्थिक, राजनीतिक, धार्मिक, प्रौद्योगिकी एवं अन्य क्षेत्रों में देखा जा सकता है|

पश्चिमीकरण की अवधारणा मानवतावादी मूल्यों को धारण किए हुए है, जिसका अभिप्राय धर्म, जाति, लिंग, आयु, आर्थिक स्थिति आदि को ध्यान में न रखते हुए सभी मनुष्यों के कल्याण में रूचि से हैं|

पश्चिमीकरण का प्रभाव भारत में चेतन तथा अचेतन दोनों रूपों में पड़ा है| कई पश्चिमी तत्त्वों को तो हम जानबूझकर ग्रहण करते हैं और कई हमें अप्रत्यक्ष तथा अचेतन रुप से प्रभावित करते हैं और वे भी हमारे व्यवहार तथा दैनिक जीवन के अंग बन गये हैं| जैसे – संयुक्त परिवार प्रणाली के स्थान पर नाभिकीय परिवार को प्राथमिकता, जाति व्यवस्था संबंधी व्यवसाय के स्थान पर योग्यता संबंधी व्यवसाय आदि|

आधुनिकीकरण (Modernization)

आधुनिकीकरण की प्रक्रिया में अल्प विकसित समाज, अधिक विकसित समाज की सामाजिक व आर्थिक विशेषताओं को अपनी आवश्यकता एवं क्षमता के अनुसार अपनाते हैं, इस तरह यह एक तार्किक प्रक्रिया हो जाती है|

आधुनिकीकरण की अवधारणा द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद तीसरी दुनिया के देशों द्वारा अनुभव की जाने वाली चुनौतियों के प्रतिउत्तर के रुप में सामने आया| स्वतंत्रता मिलने के बाद तीसरी दुनिया की सरकारें एक तरफ गरीबी, बीमारी, भुखमरी आदि समस्याओं से मुक्त होना चाहती थी, तो दूसरी तरफ पश्चिम के मानदण्ड की चाह रखते हुए भी अपनी जीवन-शैली एवं मूल्यों को छोड़ना नहीं चाहती थी| आधुनिकीकरण की अवधारणा ने उपयुक्त दोनों के बीच समन्वय स्थापित किया|

आधुनिकीकरण, पश्चिमीकरण से इस अर्थ में भिन्न है कि पश्चिमीकरण जहाँ नकल की एक प्रक्रिया है वहीं आधुनिकीकरण तार्किक प्रक्रिया है|

आधुनिकीकरण ने तीब्रगामी परिवर्तन की इच्छा रखने वाले लोगों की सांस्कृतिक पहचान या अस्मिता के लिए कोई खतरा पैदा नहीं किया, क्योंकि इसकी मूल भावना तार्किकता, वैज्ञानिकता तथा परिष्कृत प्रौद्योगिकी से जुड़ी हुई थी|

प्रो. एम.एन. श्रीनिवास ने आधुनिकीकरण में बढ़ता हुआ नगरीकरण, साक्षरता का प्रसार, प्रति-व्यक्ति आय में वृद्धि, वयस्क मताधिकार तथा तार्किक विकास को शामिल किया है|

आधुनिकीकरण एक बहु-आयामी अवधारणा है जिसके अंतर्गत सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक, सांस्कृतिक तथा मनोवैज्ञानिक आधुनिकीकरण शामिल हो जाता है|

सामाजिक आधुनिकीकरण के अंतर्गत शिक्षा, स्वास्थ्य, पेयजल आदि मूलभूत आवश्यकताओं की पूर्ति उन लोगों तक पहुंचाना है, जो आज भी मुख्यधारा में सम्मिलित नहीं है|

आधुनिकीकरण के आर्थिक आयाम के अंतर्गत आर्थिक समस्या के लिए एक उपयुक्त प्रशासनिक एवं कानूनी संरचना तथा एक सक्षम मौद्रिक बैंक संरचना के ढांचे का निर्माण करना है| यह बचत एवं पूजी निर्माण के लिए लोगों को अवसर प्रदान करती है ताकि विकास को धारण करने वाली एक अर्थव्यवस्था बन सके तथा लोग गरीबी एवं बेरोजगारी से मुक्त हो सके|

राजनीतिक आधुनिकीकरण के अंतर्गत परंपरागत समाज, लोकतांत्रिक सरकार के मूल्यों को अपनाते हैं तथा दबाव समूह को मान्यता प्रदान कर विपक्ष को संस्थागत स्वरुप प्रदान करते हैं| साथ ही वयस्क मताधिकार के माध्यम से सभी लोगों की राजनीतिक सहभागिता सुनिश्चित की जाती है|
सांस्कृतिक आधुनिकता का तात्पर्य लौकिकीकरण की प्रक्रिया को बढ़ावा देने से हैं| अपनी सोच को आस्था की जगह तर्क एवं तथ्यों पर निर्भर बनाने से हैं ताकि एक राष्ट्रीय विचारधारा की स्थापना की जा सके|

जहाँ तक मनोवैज्ञानिक आधुनिकीकरण का संबंध है यह उस प्रकार के व्यक्तित्व निर्माण कर बल देता है, जो चुनौती एवं जोखिम भरा कार्य स्वीकार कर सके| साथ ही जो कुछ असंभव है, उसे संभव करने की तरफ प्रेरित हो सके|

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