सामाजिक परिवर्तन (Social Change)

सामाजिक परिवर्तन का तात्पर्य सामाजिक संरचना में होने वाले परिवर्तन से है| चूँकि सामाजिक संरचना वर्तमान संबंधों का ताना-बाना है, अतः संबंधों में होने वाले परिवर्तन को सामाजिक परिवर्तन कहते हैं| सामाजिक संबंधों में यह परिवर्तन मित्रतापूर्ण से शत्रुतापूर्ण, अनौपचारिक से औपचारिक, प्राथमिक से द्वितीयक, स्थायी से अस्थायी, समानतापूर्ण से असमानतापूर्ण की ओर हो सकता है|

आधुनिक समाज में सामाजिक मूल्यों, संस्थाओं, संपत्ति संबंधों एवं भूमिकाओं में होने वाले परिवर्तन को सामाजिक परिवर्तन कहते हैं|

समाज के कुछ विशेष व्यक्तियों में परिवर्तन अथवा समाज के एक छोटे से भाग में या अल्पकालीन परिवर्तन को सामाजिक परिवर्तन नहीं कहा सकता, जब तक यह परिवर्तन बड़े भाग में स्थायी रूप में दिखाई न दे| एंथोनी गिडेन्स (Anthony Giddens) भी कहते हैं कि कुछ क्षणिक परिवर्तनों को सामाजिक परिवर्तन नहीं कहा जा सकता|

सामाजिक परिवर्तन एक वैज्ञानिक अवधारणा है| विकास हो या ह्रास, इसे हम सामाजिक परिवर्तन कहेंगे| यह परिवर्तन वांछित या अवांछित, स्वतः या प्रायोजित, एक रेखीय या बहु-रेखीय या चक्रिय, समस्यामूलक या गैर-समस्यामूलक, उद्विकासीय या क्रांतिकारी कुछ भी हो सकता है|

जैसा कि हम सब जानते हैं कि परिवर्तन प्रकृति का नियम है, इन्हीं अर्थों में ग्रीक दार्शनिक हेरालाइट्स कहते हैं कि “सभी वस्तुएँ परिवर्तन के बहाव में हैं|” हेरालाइट्स आगे लिखते हैं कि आप नदी की एक धारा में दो बार स्नान नहीं कर सकते|

मैकाइवर के अनुसार समाज परिवर्तनशील एवं गत्यात्मक है|

समाजशास्त्र के जनक ऑगस्त कॉम्टे ने समाजशास्त्र की विषय वस्तु को दो भागो में रेखांकित किया; पहला – सामाजिक स्थितिकी (Social Statics) एवं दूसरा सामाजिक गतिशीलता (Social Dynamics)| पहले का संबंध सामाजिक संरचना से है जबकि दूसरे का संबंध सामाजिक परिवर्तन से है|

जेन्सन (M.D. Jenson) ने अपनी पुस्तक “Introduction to Sociology and Social Problem” में लिखते हैं कि लोगों के सोचने एवं करने के तरीकों में बदलाव ही सामाजिक परिवर्तन है| (Social change may be defined as modification in ways of doing and thinking of people)

किंग्सले डेविस अपनी पुस्तक ह्यूमन सोसाइटी (Human Society) में लिखते हैं कि सामाजिक परिवर्तन का तात्पर्य केवल उन्हीं परिवर्तन से है जो सामाजिक संगठन अर्थात् समाज की संरचना एवं प्रकार्यों में घटित होता है| (By Social change is meant only such alterations as occur in social organisation that is the strucure and functions of society) जॉनसन के अनुसार अपने मूल अर्थ में सामाजिक परिवर्तन का तात्पर्य सामाजिक संरचना में परिवर्तन है|

इस तरह सामाजिक संरचना में होने वाले परिवर्तन को सामाजिक परिवर्तन कहते हैं| चूँकि सामाजिक संरचना में स्थायी संबंध होते हैं, अत इन्हीं स्थायी संबंधों में होने वाले परिवर्तन को सामाजिक परिवर्तन कहते हैं|

सामाजिक परिवर्तन दो प्रकार का होता है – संरचना में परिवर्तन (Change in structure) एवं संरचनात्मक परिवर्तन (Structural change)| संरचना में परिवर्तन को आंशिक परिवर्तन भी कहते हैं, जैसे – सुधार आंदोलन, पश्चिमीकरण, संस्कृतिकरण आदि| जबकि संरचनात्मक परिवर्तन (Structural change) को पूर्ण परिवर्तन कहते हैं, जैसे – क्रांति, औद्योगीकरण, नगरीकरण आदि|

सामाजिक परिवर्तन निम्न चार स्थितियों पर आधारित होता है –

(1) स्थान (Space) – परिवर्तन का संबंध किसी न किसी स्थान से अवश्य होता है|

(2) समय (Time) – परिवर्तन के लिए दो समय का होना आवश्यक है, एक पहले का समय एवं दूसरा वर्तमान या बाद का समय, जिसमें पहले की अपेक्षा परिवर्तन परिलक्षित हुआ है|

(3) प्रघटना (Phenomenon) – परिवर्तन का संबंध किसी वस्तु या घटना से अवश्य होता है|

(4) भिन्नता (Variation) – इसका तात्पर्य है कि यदि पहले की स्थिति एवं बाद की स्थिति में कोई बदलाव न हो तो उसे परिवर्तन नहीं कहा जा सकता| अतः दोनों स्थितयों में भिन्नता होनी चाहिए|

सामाजिक परिवर्तन की विशेषताएं (Characteristics of Social Change)

सामाजिक परिवर्तन की विशेषताओं को निम्न बिंदुओं में देखा जा सकता है –

(1) सामाजिक परिवर्तन सार्वभौमिक घटना है|

(2) सामाजिक परिवर्तन समाज की संरचना एवं प्रकार्यों में परिवर्तन को कहते हैं|

(3) सामाजिक परिवर्तन की प्रकृति सामाजिक होती है|

(4) सामाजिक परिवर्तन अनिवार्य एवं स्वाभाविक घटना है|

(5) सामाजिक परिवर्तन की गति सभी जगह समान नहीं होती है|

(6) किसी समाज में परिवर्तन की क्या गति होगी यह उस समाज में विद्यमान अन्य कारकों पर निर्भर करता है|

(7) सामाजिक परिवर्तन कभी भी एक कालिक (Time) नहीं हो सकता, यह दो काल में ही देखा जा सकता है|

सामाजिक परिवर्तन के कारक (Factors of Social Change)

विभिन्न विद्वानों ने सामाजिक परिवर्तन के अनेक कारकों का उल्लेख किया है, जिसे निम्न स्वरूपों में देखा जा सकता है –

(1) सामाजिक परिवर्तन के जनसंख्यात्मक कारक (Demographic factors of Social Change)

(2) सामाजिक परिवर्तन के जैविकीय कारक (Biological factors of social change)

(3) सामाजिक परिवर्तन के प्रौद्योगिकी कारक (Technological Factors of Social Change)

(4) सामाजिक परिवर्तन के आर्थिक कारक (Economic factors of Social change)

(5) सामाजिक परिवर्तन के सांस्कृतिक कारक (Cultural factors of Social Change)

उपर्युक्त सभी कारको को विस्तार में पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें- सामाजिक परिवर्तन के कारक (Factors of Social Change)

सोरोकिन अपनी पुस्तक सोशल एण्ड कल्चरल डायनामिक्स (Social and Cultural Dynamics) में सामाजिक परिवर्तन का सांस्कृतिक सिद्धांत प्रस्तुत करते हैं| उनके अनुसार संस्कृति मूलतः एक सामूहिक मनोवृत्ति है, जो एक समय में पूरे समाज में व्याप्त रहता है| इसे सोरोकिन ने सांस्कृतिक मनोवृत्ति कहा है|
सोरोकिन संस्कृति की तीन अवस्थाओं विचारात्मक (Ideational) , आदर्शात्मक (Idealistic) एवं चेतनात्मक (Sensate) का उल्लेख करते हैं| उनके अनुसार सामाजिक परिवर्तन घड़ी के पेण्डुलम की भाँति एक अवस्था से दूसरे अवस्था के बीच घूमता रहता है|

सोरोकिन ने मुख्य रूप से विचारात्मक एवं चेतनात्मक संस्कृति का उल्लेख किया है और प्रत्येक समाज इन्हीं दो संस्कृतियों के बीच घूमता रहता है| उनके अनुसार एक संस्कृति चरम पर पहुँचने के बाद वापस दूसरी संस्कृति के चरम तक पहुँचती है| इन्हीं दो संस्कृतियों के बीच जो सांस्कृतिक मनोवृत्ति का परिवर्तन होता है, वही सामाजिक परिवर्तन है|

सोरोकिन के अनुसार उपर्युक्त दोनों संस्कृतियों के बीच एक ऐसी स्थिति आती है, जहाँ चेतनात्मक एवं विचारात्मक दोनों संस्कृतियों का मिश्रण होता है, सोरोकिन इसे आदर्शात्मक संस्कृति कहते हैं|
ऑगबर्न (Ogburn) अपनी पुस्तक सोशल चेंज (Social Change) में सांस्कृतिक विलम्बना (Cultural Lag) के सिद्धांत के आधार पर सांस्कृतिक परिवर्तन की चर्चा करते हैं| ऑगबर्न ने संस्कृति को दो भागों भौतिक (Material) एवं अभौतिक संस्कृति (Non-Material Culture) में विभाजित किया| भौतिक संस्कृति के अंतर्गत भौतिक वस्तुओं जैसे – रेल, मकान, पुस्तकें आदि; जबकि अभौतिक संस्कृति के अंतर्गत धर्म, कला, विचार, विश्वास आदि आ जाते हैं|

ऑगबर्न लिखते हैं कि विकास की प्रक्रिया में भौतिक संस्कृति का विकास तेजी से होता है एवं अभौतिक संस्कृति उससे पीछे रह जाती है, तात्पर्य है कि हम भौतिक वस्तुओं जैसे – गाड़ी, बंगला, नई तकनीक (जैसे- मोबाइल) आदि को जल्दी अपना लेते हैं, लेकिन अपने विचार, विश्वास, धर्म आदि को आसानी से परिवर्तित नहीं करते| यही अभौतिक संस्कृति जब भौतिक संस्कृति से पिछड़ जाती है तो इसे ऑगबर्न सांस्कृतिक विलम्बना (Cultural Lag) कहते हैं| इन दोनों संस्कृतियों के असंतुलन का समाज पर प्रभाव पड़ता है एवं समाज में परिवर्तन दिखाई देता है|

 

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