क्षेत्रीय एवं धार्मिक विश्वास, व्यवहार एवं सांस्कृतिक प्रतिमान
(Regional and Religious Beliefs, Practices and Cultural Pattern)

धर्म अति-प्राकृतिक शक्तियों तथा अन्य वस्तुओं से संबंधित विश्वास की एक व्यवस्था है| जिसका उसके अनुयायियों के व्यवहार पर प्रभाव पड़ता है| भारतीय धर्म अपने विश्वास, कार्य-प्रणालियों एवं संगठन में एक दूसरे से बहुत भिन्न है, साथ ही धार्मिक भावनाएँ इतनी व्यक्तिनिष्ठ हैं कि इनका पूर्णरूपेण वस्तुपरक विश्लेषण संभव नहीं हो पाता है| यही कारण है कि धर्म की कोई परिभाषा अनिवार्यता सभी विश्वास व्यवस्था पर संतोषप्रद ढंग से लागू नहीं होती है|

किंग्सले डेविस (Kingsley Davis) के अनुसार यही कारण है कि धर्म अर्थात रिलिजन की कोई परिभाषा भारतीय विश्वास व्यवस्था पर लागू नहीं हो पाती|

भारतीय विश्वास व्यवस्था के अंतर्गत बहुत सारे मत ऐसे हैं जो अति प्राकृतिक सत्ता को स्वीकार नहीं करते – जैसे बौद्ध एवं जैन धर्म ईश्वर को नहीं मानते है| विश्वास व्यवस्था के अंतर्गत अति-प्राकृतिक स्थान जैसे – स्वर्ग- नरक की कल्पना सभी धर्मों में नहीं पायी जाती है| इस तरह धर्म की परिभाषा सार्वभौमिक न होकर किसी विशिष्ट समूह के विश्वास व्यवस्था के संदर्भ से जुड़ जाती है| हिंदू धर्म में वैदिक, पौराणिक एवं शाक्त तीन प्रकार की धाराएँ दिखायी देती हैं| आर्यों का धर्म मूलतः बहु-देववादी था| इनके देवता प्रकृति की अलौकिक शक्तियों के मानवीकृत रूप थे, जैसे – सूर्य, पृथ्वी, इंद्र, अग्नि, वायु, वरुण आदि| आज भी कोणार्क का सूर्य मंदिर इसी विश्वास को इंगित करता है|आत्मा, धर्म, कर्म, मोक्ष, जाति, समुदाय, क्षेत्र आदि के आधार पर एक ही धर्म, एक ही विश्वास को मानने वाले लोगों में भिन्न-भिन्न व्याख्याएँ पायी जाती है|

हिंदुओं में माना जाता है कि आत्मा न तो जन्म लेती है और न ही उसकी मृत्यु होती है सिर्फ इसका शरीर बदलता है, इसलिए मृत शरीर को जला दिया जाता है| जबकि बौद्ध धर्म आत्मा के अस्तित्व को ही नकार देता है जबकि जैन धर्म आत्मा को तो मानता है लेकिन ईश्वर की सत्ता को मानने से इनकार करता है|

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