सांस्कृतिक विविधता – भाषा, नृजातियता एवं जाति से संबंधित
(Cultural Diversity : In relation to Language, Ethnicity and Caste)

भाषा (Language)

भारतीय संविधान की आठवी अनुसूची में 22 भाषाओं का उल्लेख हैं| इनमें से 3 भाषाओं संस्कृत, तमिल एवं कन्नड़ को शास्त्रीय भाषा के रुप में मान्यता प्राप्त है| इसके अतिरिक्त यदि किसी क्षेत्र की अपनी विशेष भाषा है तब भी संविधान के अनुछेद 29 के तहत उसे बनाए रखने का अधिकार है| साथ ही अनुच्छेद 350-क के अंतर्गत प्रत्येक राज्य भाषायी अल्पसंख्यकों के बालकों के लिए शिक्षा के प्राथमिक स्तर पर मातृभाषा में शिक्षा की पर्याप्त सुविधाओं की व्यवस्था का प्रयास करेगा है|

भारत में बोली जाने वाली भाषा को चार भाषा परिवारों में बाटा गया है –

(1) आर्य भाषा परिवार (77%)

(2) द्रविण भाषा परिवार (20.61%)

(3) ऑस्ट्रिक भाषा परिवार (1.2%)

(4) तिब्बती चीनी भाषा परिवार (0.8%)

स्वतंत्रता के पश्चात भारतीय संविधान में हिंदी को राष्ट्रभाषा की रूप में स्वीकार किया गया| भाषायी आधार पर पृथक होने वाला भारत का पहला राज्य आंध्र प्रदेश है जो 1953 में अलग हुआ था|

नृजातीय विविधता (Ethnic Diversity)

सामान्य अर्थों में धर्म या प्रजातीय भिन्नता को नृजातीयता समझ लिया जाता है| वास्तव में नृजातियता एक भावना है| जब धर्म, भाषा, जाति, रंग, संस्कृति, क्षेत्र आदि के आधार पर कोई समूह एकजुट होकर अपनी भावना प्रदर्शित करे तो उसे नृजातियता कहते हैं| नृजातीय मनोवृत्ति, राष्ट्रीय मनोवृत्ति या हित से पृथक होती है|

नृजातियता के कारणों में मुख्य रूप से गरीबी, अशिक्षा बेरोजगारी, पहचान संकट जैसी समस्याएँ होती हैं| इन्हीं समस्याओं के आधार पर कुछ नृजातीय समूह जैसे – विदर्भ, गोरखालैंड, बोडोलैंड आदि अपनी नृजातीय भावना को समय-समय पर प्रकट करते रहते हैं|

भारत में जातिगत भिन्नताएँ

भारत में जाति व्यवस्था का सामाजिक संस्थाओं में महत्वपूर्ण स्थान है| आदिकाल से ही जाति प्रथा का प्रचलन रहा है| अंत:विवाही होने के कारण जातियों की संख्या में उत्तरोत्तर वृद्धि होती गयी| 1901 की जनगणना में 2378 मुख्य जातियाें की पहचान की गयी थी| लेकिन 1931 की जनगणना में भारत में 2993 जातियों एवं उप-जातियों का समूह पाया गया था|

डॉ सक्सेना का मत है कि जाति हिन्दू सामाजिक संरचना का एक प्रमुख आधार रहा है| जिससे हिंदुओं का सामाजिक, सांस्कृतिक, आर्थिक और राजनीतिक जीवन प्रभावित होता रहा है| हिंदुओं के सामाजिक जीवन के किसी भी क्षेत्र का अध्ययन बिना जाति के विश्लेषण के अपूर्ण ही रहता है|

भारत में जाति व्यवस्था से मुसलमान भी अछूते नहीं हैं| जब कुछ हिंदू मुसलमान धर्म अपना लिए| तब वे मुस्लिम धर्म में पूरी तरह शामिल नहीं हो पाए बल्कि उसी धर्म में एक जाति के रूप में अलग पहचान मिल गयी|

मुसलमानों में मुख्यत: दो प्रकार की जातियाँ पायी जाती है – अशरफ एवं गैर-अशरफ जातियाँ| अशरफ जातियाँ पुन: तीन भागों में विभाजित हैं|

(1) सैयद– सय्यद को मोहम्मद साहब के बेटी एवं दामाद का वंशज माना जाता है|

(2) शेख – ये मुख्यत: अरब या पर्सिया से आए थे|

(3) मुगल – तुर्की मूल के लोग जो मुगलों के साथ भारत आए थे|

गैर-अशरफ जातियाँ वे हैं जो हिंदू से मुसलमान बनी हैं|

इस तरह हम देखते हैं कि भारत में हिंदुओं में जातिगत विशेषता इतनी प्रभावी रूप से विद्यमान है कि धर्म बदलने पर भी जातिगत पहचान से मुक्ति नहीं मिल पाती है| इसीलिए एम.एन. श्रीनिवास ने कहा है कि भारत में धर्म बदलना आसान है लेकिन जाति बदलना नहीं|

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