दुर्बल वर्ग जनजातियाँ (Weaker Section Tribes)

जनजाति एक क्षेत्रीय समुदाय होता है| संवैधानिक शब्दावली में इसे अनुसूचित जनजाति कहते हैं| ये अपनी अधिकांश आवश्यकता की पूर्ति के लिए वनों पर निर्भर रहते हैं| इनका क्षेत्र नातेदारी तक सीमित होता है| यह समाज में सबसे अलग रहते हैं| अलगाव के कारण समाज की मुख्यधारा से कटे रहते हैं परिणाम स्वरूप बहुत पिछड़ापन दिखायी देता है| 2011 की जनगणना के अनुसार जनजातियों की संख्या भारत की कुल जनसंख्या का 8.6% हैं|

भारतीय संविधान में जनजातियों की कोई परिभाषा नहीं दी गई है बल्कि राष्ट्रपति को यह अधिकार है कि वे अनुसूचित जनजाति आयोग की संस्तुति पर किसी भी समुदाय को अनुसूचित जनजाति घोषित कर सकते हैं|

डी. एन. मजूमदार (D. N. Mazumdar) के अनुसार जनजाति परिवारों का एक समूह होता है जिसके सदस्य एक ही भाषा का प्रयोग करते हैं, एक ही क्षेत्र में निवास करते हैं, विवाह तथा पेशा से संबंधित समान निषेध का पालन करते हैं तथा उनके बीच सुविकसित पारस्परिक विनिमय तथा आपसी लेनदेन की व्यवस्था पायी जाती है|

जनजातियों की विशेषतायें –

(1) एक निश्चित क्षेत्र होता है|

(2) समुदाय नातेदारी तक सीमित होता है|

(3) सामान्य भाषा एवं संस्कृति होती है|

(4) एक विशिष्ट नाम होता है|

(5) प्रकृति पर निर्भरता रहती है|

(6) अंत:विवाही समूह होता है|

जनजातियों के विभिन्न नाम –

ठक्कर बापा ने इन्हें आदिवासी कहा है|

जी. एस. घुरिये ने पिछड़े हिंदू कहा है|

हट्टन ने आदिम जाति कहा है|

भारतीय संविधान में ये अनुसूचित जनजाति के नाम से जानी जाती है|

जनजातियाँ इतनी पिछड़ी हैं कि विवाह संबंधी जानकारी की शिक्षा प्रदान करने के लिए इनमें युवा गृह (Youth Dormitory) पाया जाता है|

जनजातियों की समस्यायें –

(1) निवास स्थान मुख्य समाज से अलग होता है|

(2) आर्थिक दृष्टि से दीन-हीन स्थित होती है|

(3) सामाजिक संपर्क से अस्मिता का खतरा रहता है|

(4) स्वास्थ्य संबंधी समस्याएँ रहती हैं|

(5) शिक्षा, तकनीक की अनुपलब्धता रहती है|

(6) समाज के साथ एकीकरण में समस्या रहती है|

(7) अधिकार एवं कर्तव्य के प्रति अचेतन हैं|

जनजातियों में आज भी अधिकांश गरीबी रेखा के नीचे जीवन यापन कर रहे हैं| उनमें साक्षरता दर बहुत ही कम है| कुपोषण एवं बीमारियों से ग्रस्त हैं तथा मुख्यधारा में शामिल होने में भय महसूस करते हैं| दूर-दराज क्षेत्रों में रहने के कारण स्वास्थ्य सुविधाएं आसानी से उपलब्ध नहीं हो पाती हैं|

समस्या का समाधान –

जनजातियों का गैर-जनजातियों के संपर्क में आने के कारण तीव्र सांस्कृतिक परिवर्तन के शिकार हुए एवं अनुकूलन करने में असफल रहे, जो उनके जनसंख्या ह्रास के रूप में सामने आया| इसके अध्ययन का श्रेय ब्रिटिश मानवशास्त्री वेरियर एल्विन (Verrier Elwin) को जाता है| जिन्होंने मध्य प्रदेश की बैगा जनजाति का अध्ययन कर इसे विनाश से बचाने के लिए कुछ सुझाव दिए| जिसे पृथकतावादी या राष्ट्रीय उद्यान नीति (National Park Policy) के नाम से जाना जाता है| इस नीति के अनुसार जनजातियों को मुख्य समाज से अलग रखा जाना चाहिए|इसके विपरीत सात्मीकरण (Assimilation) दृष्टिकोण का जन्म हुआ| जिसके जन्मदाता ठक्कर बापा हैं| इन्हें जनजातियों का मसीहा भी कहा जाता है| इनके अनुसार जनजातियों को पूरी तरह समाज की मुख्यधारा में शामिल कर दिया जाना चाहिए|उपरोक्त दोनों दृष्टिकोणों के संश्लेषण से एकीकरणवादी (Integrationist) दृष्टिकोण का जन्म हुआ| इसमें जनजातियों के संरक्षण के साथ-साथ विकास पर भी बल दिया गया| जी.एस. घुरिये ने इस दृष्टिकोण का समर्थन किया|

अनुसूचित जनजातियों के लिए संवैधानिक प्रावधान (Constitutional Provision for Schedule Tribes) –

(1) संविधान के अनुच्छेद 338-क के अंतर्गत अनुसूचित जनजाति आयोग के गठन का प्रावधान किया गया है|

(2) संविधान की पाँचवी अनुसूची (5th Schedule) में अनुसूचित क्षेत्रों और अनुसूचित जनजातियों के प्रशासन और नियंत्रण के बारे में उपबंध है|

(3) संविधान की छठवीं अनुसूची (6th Schedule) में असम, मेघालय, त्रिपुरा और मिजोरम राज्यों के जनजाति क्षेत्रों के प्रशासन के बारे में उपबंध है|

(4) अनुच्छेद 330 में लोकसभा में अनुसूचित जनजातियों लिए स्थानों का आरक्षण है|

(5) अनुच्छेद 332 में राज्यों की विधानसभाओं में अनुसूचित जनजातियों के लिए आरक्षण का प्रावधान है|


 

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