समाजशास्त्र का उद्भव (Emergence of Sociology)

समाजशास्त्र का उद्भव यूरोपीय महाद्वीप में उस समय हुआ जब वहां की जनता सामंतवादी व्यवस्था के प्रति असहज एवं असुरक्षित महसूस करने लगी साथ ही वह अपनी तात्कालिक परिस्थितियों से निजात पाने का प्रयास करने लगी | यह प्रयास औद्योगिक क्रांति (1760)एवं फ्रांसीसी(1789) क्रांति के रूप में सामने आया जिसने वहां की परंपरागत सामाजिक ढांचे को विस्थापित कर एक अत्यधिक नवीन सामाजिक व्यवस्था को जन्म दिया | इन्हीं बदलती परिस्थितियों को समझने के लिए फ्रांसीसी दार्शनिक अगस्त काम्टे (August Comte) ने एक अलग विषय की आवश्यकता पर बल दिया तथा सन् 1838 में इसके लिए समाजशास्त्र (Sociology) शब्द का प्रयोग किया |

समाजशास्त्र के उद्भव के कारण
(Factors of emergence of sociology)

समाजशास्त्र के उद्भव के लिए यूरोप की ऐतिहासिक दशाएं तथा तत्कालीन सामाजिक परिस्थितियां तो जिम्मेदार थी, साथ ही वे बौद्धिक संवेदनाये भी शामिल थी, जो सेंट साइमन, कार्ल मार्क्स, अगस्त काम्टे आदि चिंतकों के विचारों द्वारा अभिव्यक्त हुआ | इस तरह समाजशास्त्र के उद्भव के कारणों को निम्न तीन बिंदुओं में देखा जा सकता है –

      1. ऐतिहासिक कारक
        • वाणिज्यिक क्रांति
        • वैज्ञानिक क्रांति
      2. बौद्धिक कारक
      3. सामाजिक कारक
        • औद्योगिक क्रांति
        • फ्रांसीसी क्रांति

ऐतिहासिक कारक

ऐतिहासिक कारकों पर नजर डालें तो यूरोप में 12वीं शताब्दी में हुई वाणिज्यिक क्रांति एवं 14वीं शताब्दी में हुई वैज्ञानिक क्रांति ने जनता को यह सोचने पर मजबूर कर दिया कि उसकी दीन हीन दशा में सुधार राजा या धर्म प्रचारको की कृपा से नहीं बल्कि स्वयं के प्रयास से ही हो सकता है |

(i) वाणिज्यिक क्रांति – वाणिज्यिक क्रांति के दौरान यूरोप के लोग सिल्क, मसालों एवं अन्य वस्तुओं के नए क्षेत्रों की खोज किए, साथ ही नए स्थापित हो रहे राज्य समुद्री यात्रा के द्वारा व्यापार के नए रास्ते तलाशने लगे जिससे यूरोप वासियों को बड़ा व्यापार क्षेत्र एवं आय के नए स्रोत प्राप्त हो गए, जो उनकी आर्थिक स्थिति सुधारने में मददगार साबित हुआ |

(ii) वैज्ञानिक क्रांति – इस क्रांति ने यूरोप की सामंतवादी परंपरागत सोच को बदलने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई | इसकी शुरुआत कॉपरनिकस से होती है जब उन्होंने यह कर रुढ़िवादी एवम् धार्मिक कट्टरपंथी को चुनौती दी की ब्रह्माण्ड के केंद्र में सूर्य है ना कि पृथ्वी | इसके अतिरिक्त न्यूटन द्वारा प्रतिपादित गति का नियम(Law of motion) एवं सार्वभौमिक गुरुत्वाकर्षण के नियम ने लोगों कोे प्रकृति के बारे में नए सिरे से सोचने को प्रेरित एवं बाध्य किया | यूरोप की इस बदलती मनोवृत्तियों के काल को पुनर्जागरण (Renaissance) कहा गया |

बौद्धिक कारक

उन्नीसवीं शताब्दी में हीगेल(Hegel) एवं सेंट साइमन का लेखन यूरोप में एक बौद्धिक आंदोलन बन गया | हीगेल के अनुसार चेतना से अस्तित्व का निर्माण होता है , जिसके माध्यम से वे यूरोप की जनता को यह संदेश देना चाहते थे कि यदि व्यक्ति अपनी सोच को दृढ़ता पूर्वक यथार्थ में बदलने की कोशिश करें तभी वह अपनी दीन- हीन स्थित से मुक्ति पा सकता है न कि राजा या ईश्वरीय कृपा से | साथ ही अपनी पुस्तक फिलासॉफी ऑफ राइट(Philosophy of Right) में राज्य एवं नागरिक समाज के संबंधो को व्यक्त करतेे हैं | उनका मत है कि अधिकार और कर्तव्य दोनों राज्य के अंदर एक साथ एक ही संबंध में बधें हैं , तात्पर्य है कि यदि व्यक्ति राज्य के प्रति अपने कर्तव्यों का पालन कर रहा है तो उन कर्तव्यों से जुड़े उनके अधिकार भी होने चाहिए |

सेंट साइमन के अनुसार यद्यपि यूरोप में विज्ञान विद्यमान है ,लेकिन व्यक्तियों को समझने के लिए कोई विज्ञान मौजूद नहीं है | अतः समाज का वैज्ञानिक अध्ययन होना चाहिए |
यह बौद्धिक आंदोलन यूरोपीय सामाजिक व्यवस्था से भिन्न नहीं था क्योंकि तीव्र सामाजिक परिवर्तन एवं समुद्र मार्ग से बढ़ते व्यापार के द्वारा अन्य देशो से मिली संस्कृतियों की भिन्नता के कारण समाज संक्रमण के दौर से गुजर रहा था ,तथा प्राकृतिक विज्ञान के बढ़ते प्रभाव के कारण लोग यह समझने लगे थे कि जो ज्ञान सत्यापनीय नहीं है उसे स्वीकार नहीं करना चाहिए | इस बदलती सोच के समय को प्रबोधन युग (Age of enlightenment) के नाम से जाना जाता है | इसी सोच के कारण ही फ्रांसीसी एवं औद्योगिक क्रांतियाँ हुई |

समाजशास्त्र की शुरुआत प्रबोधन कालीन दार्शनिक मांटेस्क्यू एवं रूसो के विचारों से ही हो जाती है जब वे कहते हैं कि मनुष्य स्वयं ब्रह्माण्ड को नियंत्रित कर सकता है |अतः उसे परंपरागत रूढ़ियों एवं अंधविश्वासो को छोड़कर नए सिरे से विचार करना चाहिए |

विज्ञान के बढ़ते प्रभाव के कारण लोगों द्वारा पुरानी परंपराओं एवं संस्थाओं से अपने को अलग करने प्रवृत्ति बढ़ती जा रही थी | इन्हीं परिस्थितियों में समाज वैज्ञानिकों ने भी सामाजिक समस्या का समाधान वैज्ञानिक तरीके से सुलझाने की तरफ प्रेरित हुए | अगस्त काम्टे भी प्रबोधन कालीन विचारों से प्रभावित थे एवं ऐसे सिद्धांतो का निर्माण करना चाहते थे जो अानुभविक ज्ञान एवं तथ्यों पर आधारित हो | साथ ही ऐसे सामाजिक विज्ञान का निर्माण करना चाहते थे जो समाज का समग्रता में अध्ययन करें क्योंकि अन्य सामाजिक विज्ञान समाज के किसी विशेष पक्ष का ही अध्ययन करता है | वैज्ञानिकता के महत्व को देखते हुए काम्टे ने सर्वप्रथम अपने विषय का नाम सामाजिक भौतिकी(Social Physics) रखा |

सामाजिक कारक

(i) औद्योगिक क्रांति (Industrial Revolution) – औद्योगिक क्रांति की शुरूआत 1760 से मानी जाती है, जो मुख्यत: कपास (Cotton) ,खनन (Mining) तथा परिवहन (Transportation) के क्षेत्र में शुरु हुई ,किंतु लोगों ने अपनी बुद्धि का प्रयोग कर अन्य क्षेत्रों में भी मशीनों का आविष्कार कर लिया | यह समय औद्योगीकरण का था जिसके अंतर्गत कृषि का मशीनीकरण , टेक्सटाइल उद्योग, विनिर्माण एवं ऊर्जा के क्षेत्र में क्रांतिकारी परिवर्तन हुए | जिसने लोगों के सामाजिक ,आर्थिक एवं सांस्कृतिक जीवन को प्रभावित किया |

औद्योगिक क्रांति शब्द का प्रयोग सर्वप्रथम ब्लांकी ने किया था ,लेकिन यह चर्चा में तब आया जब ब्रिटिश इतिहासकार अर्नाल्ड टॉयनबी (Arnold Toynbee) ने इस शब्द का प्रयोग ब्रिटेन में 1760 से 1840 के बीच हुए आर्थिक विकास का वर्णन करने के लिए किया |

औद्योगिक क्रांति समाजशास्त्रीय दृष्टि से इसलिए महत्वपूर्ण साबित हुइ क्योंकि इसने न केवल उत्पादन के क्षेत्र में व्यापक बदलाव लाया ,बल्कि लोगों ने पहली बार अभाव मुक्त समाज की संभावनाओं का अनुभव किया | उस दौरान ब्रिटेन की सामूहिक आवश्यकता से लगभग दस गुना अधिक उत्पादन हुआ था | इस संपन्नता ने लोगों की बौद्धिक सोच में भी परिवर्तन लाया क्योंकि औद्योगिक क्रांति से पहले मनुष्य अपनी दरिद्रता का कारण प्राकृतिक या दैवीय शक्तियों की इच्छाओं का प्रतिफल माना करता था | लेकिन जब उसने स्व प्रयास से अपनी आवश्यकता से अधिक उत्पादन करने में सफलता प्राप्त की , तब उसके ईश्वरीय सत्ता के विश्वास में कमी आयी एवं इस विचार ने जन्म लिया कि हमारे दरिद्रता का कारण हमारा शोषण एवं हमारी अज्ञानता है न कि ईश्वरीय सत्ता |

औद्योगिक क्रांति के दौरान लोग कृषि कार्य छोड़कर फैक्टरी काम की तलाश में शहरों की तरफ पलायन करने लगे | इस तरह क्रांति के दौरान उत्पादन , विनिर्माण ,वितरण आदि में बड़ा बदलाव दिखाई दिया | इस बदलती व्यवस्था के साथ बाल अपराध ,संगठित अपराध , मालिक कर्मचारी विवाद आदि नई चुनौतियों के रुप में सामने आया | इसका समाधान ढूढ़ने में हम अगस्त काम्टे के प्रयासों को देख सकते हैं | उनके अनुसार इन परिवर्तनो को समझने के लिए हमें समाज की वास्तविकता को पूर्ण रूपेण समझना होगा एवं इसके लिए एक अलग विषय का होना अति आवश्यक है ,जिसके लिए उन्होंने समाजशास्त्र शब्द का प्रयोग किया |

(ii) फ्रांसीसी क्रांति (French Revolution) – फ्रांसीसी क्रांति स्वतंत्रता (Liberty) ,समानता(Equality)एवं बंधुत्व(Fraternity) के लक्ष्य के साथ सन् 1789 में शुरु हुई | क्रांति से ठीक पहले फ्रांस की आर्थिक स्थिति बहुत ही जर्जर थी | रोटी का एक टुकड़ा की कीमत किसानों के कई दिनों की मजदूरी के बराबर था | बोर्बन राजवंश का राजा लुई 16वाँ इस संकट से लोगों को बाहर लाने में असफल रहा | जनता भूखों मर रही थी | दूसरी तरफ राजवंश परिवार के सदस्य एवं उसके कर्मचारी विलासितापूर्ण जीवन व्यतीत कर रहे थे | ऐसे में भारी माञा में लोगों पर लगाए गए कर (Tax) ने इसे क्रांति में बदल दिया | यह क्रांति इतिहास को बदल देने वाली घटना साबित हुई | इस क्रांति ने पुराने नियमो एवं विशेषाधिकार को पीछे छोड़ दिया एवं सामंतवादी व्यवस्था के स्थान पर एक नई व्यवस्था का निर्माण किया |

स्पष्ट है कि उपर्युक्त वर्णित विभिन्न घटनाएं समाज को पूरी तरह से बदलने का प्रयास किया जिसके कारण नए समाज को समझने के लिए फ्रांसीसी दार्शनिक अगस्त काम्टे ने नये विषय समाजशास्त्र को जन्म दिया |

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